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सही हकदार का चयन आसान नहीं

दृष्टिकोण. इस वर्ष भी किसी को भारत रत्न न देकर केंद्र सरकार ने सुरक्षात्मक रवैये का ही प्रदर्शन किया है। इसको लेकर उठे राजनीतिक विवादों के कारण इस प्रतिष्ठित पुरस्कार की छवि इस कदर प्रभावित हो गई थी कि सरकार को इस पर ‘अनिर्णय’ की स्थिति पेश करना ही बेहतर लगा।

इस बार यह पुरस्कार किसे दिया जाए इसकी सूची दिन पर दिन लंबी ही होती गई। सबसे पहले लालकृष्ण आडवाणी ने अटल बिहारी बाजपेयी का नाम सुझाया, फिर मायावती ने कांशीराम की पैरवी की, राष्ट्रीय लोकदल के अजीत सिंह ने चौधरी चरण सिंह, बीजू जनतादल ने बीजू पटनायक और वामपंथियों ने ज्योति बसु का नाम आगे कर दिया । देखा जाए तो इन सभी ने भारत रत्न पर विवादों को ही आमंत्रित करने का काम किया।

वैसे भी किसी एक को खुश कर, शेष को नाखुश करना राजनीतिक स्तर पर बहुत गलत सिद्धांत माना जाता है। पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री जैसे नागरिक सम्मानों का सबसे दुखद पहलू इनके चयन का आधार ही है। इस वर्ष एक बार फिर यही बात प्रमुखता से सामने आई है। इस सम्मान के लिए योग्य उम्मीदवारों के चयन का आधार सफलता का पैमाना ही बनता जा रहा है। एक ऐसा पैमाना जिसे हम धन-दौलत, ताकत या पहचान या फिर सत्ता के गलियारों में पहुंच के आधार पर आंकते हैं।

खासकर दिल्ली के सत्ता के गलियारों में पहुंच ही इसका मुख्य पैमाना माना जाने लगा है। इसे समझते हुए तनिक भी आश्चर्य नहीं होता, जब हम क्षमतावान और प्रतिभाशाली उम्मीदवारों को इन सम्मानों के लिए अपने-अपने बायोडाटा के साथ राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के सामने लाइन लगाए खड़ा पाते हैं। इसके लिए विधायकों, सांसदों और अन्य संस्थाओं के सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर अभियान चलाना भी एक परंपरा बन चुका है। दूसरे शब्दों में कहें तो लॉबिंग इसके लिए उपयुक्त शब्द रहेगा।

यहां यह आशय कतई नहीं है कि जिन्हें भी ये प्रतिष्ठित सम्मान मिलते हैं वे क्षमतावान या प्रतिभाशाली प्रोफेशनल्स नहीं हैं। हम सभी जानते हैं कि सुदूर क्षेत्रों में शिक्षा की बुनियादी सेवाओं का ढांचा तैयार करने वाले, देश के पिछड़े और जनजातीय क्षेत्रों में लोगों को शिक्षित बनाने के लिए अपना सारा जीवन होम कर देने वाले अमूमन इस सूची में शामिल नहीं होते। ऐसे समाजसेवी अपने लिए लॉबिंग नहीं करते और कोई अपनी तरफ से इनका हाल जानने की इच्छा नहीं प्रकट करता। कुछ-कुछ ऐसा ही काम इन पुरस्कारों के लिए बनी चयन समिति को करना चाहिए।

फिर एक यक्ष प्रश्न भी सिर उठाता है कि क्या अपने क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले को सम्मान से नवाज देना चाहिए? अगर यही बात है तो सीआईआई या संगीत नाटक अकादमी या साहित्य अकादमी को ऐसे लोगों को पुरस्कृत कर सम्मान से नवाजना चाहिए। या इस सम्मान को हासिल करने के लिए कुछ और भी करने की जरूरत है। कुछ ऐसा जो समाज को एक नई चेतना या जागरूकता प्रदान करे।

खैर, एक बार फिर लौटते हैं भारत रत्न पर। अगर हालिया विवादों से कोई एक बात प्रमुखता से उभरकर सामने आती है तो वह है राजनेताओं को देश के इन सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों के दायरे से दूर ही रखने की जरूरत है। राजनीतिज्ञों को सम्मानित करने की कतई कोई आवश्यकता नहीं है। कारण, इनमें से जो भी प्रतिभाशाली होते हैं, वे शीर्ष पद पर पहुंच ही जाते हैं, भले ही वे मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बन जाएं। इसके अलावा उन्हें परस्पर एक-दूसरे को भी सम्मानित किए जाने की कोई जरूरत नहीं है। न ही इन पुरस्कारों के लिए गठित समिति में इन्हें कोई पद मिलना चाहिए।

शायद यहां इन पुरस्कारों को देने की एक प्रक्रिया है कि किसे यह पुरस्कार दिया जाना चाहिए। पर हम सभी जानते हैं कि जो राजनीतिज्ञ सत्ता में हैं उनकी सहमति ही अंतिम होती है। आइए अब ईमानदार बनें। पिछले दो दशकों से अधिकांशत: ये पुरस्कार आगे के राजनीतिक एजेंडे को ध्यान में रखकर ही दिए गए हैं। नहीं तो पिछले ६क् सालों में किसी सरकार ने क्यों नहीं महात्मा गांधी को भारत रत्न के लिए चुना? गांधीजी के जीवनकाल में ही उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार देने का विचार किया गया था, पर किन्हीं कारणों से नहीं दिया जा सका।

पर यह पुरस्कार उन्हें उनकी मृत्यु के बाद भी दिया जा सकता है। बाद में संयुक्त राष्ट्र ने भी औपचारिक रूप से इसे स्वीकार किया है। अहिंसा दिवस के रूप में २ अक्टूबर और गांधीजी की प्रासंगिकता पूरे विश्व में लगातार बढ़ रही है। लेकिन आज तक उन्हें भारत रत्न नहीं दिया गया है, जबकि मरणोपरांत भी यह पुरस्कार उन्हें दिया जा सकता है। यह सही है कि गांधीजी किसी पुरस्कार के मोहताज नहीं हैं पर जो सवाल उठाया जा रहा है वह इससे भिन्न है।

आज के दिन उनको यह सम्मान देना राजनेताओं को कोई राजनीतिक फायदा नहीं दे सकता। इसी वजह से सरदार पटेल, जिन्होंने देशीय रजवाड़ों को भारतीय गणराज्य के साथ एकीकृत करने का कार्य किया था, को उनकी मृत्यु के ४क् वर्षो बाद ही भारत रत्न पुरस्कार दिया गया। १९८८ में जब कांग्रेस सरकार ने तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन को उनकी मृत्यु के तुरंत बाद भारत रत्न प्रदान किया, तभी से इन पुरस्कारों के चयन में खुले तौर पर राजनीतिक दखल की स्पष्ट रूप से पहचान हो सकी। राजीव गांधी को यह पुरस्कार उनकी हत्या के बाद भावनात्मक लहर में बहकर दिया गया, क्योंकि उस समय के राष्ट्रपति ने इस प्रकार की घोषणा की थी। नरसिंह राव सरकार ने इस कार्य को सम्पन्न किया। इंदिरा गांधी को यह पुरस्कार उनके प्रधानमंत्री और डॉ राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति रहते दिया गया। औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश सरकार भी अपने प्रति ईमानदार लोगों को जमींदारी या सम्मान प्रदान करती थी। स्वतंत्र भारत में ये पुरस्कार सत्ता में स्थित लोगों के हाथ में संरक्षण के हथियार बन गए हैं। इसमें बुरा क्या है?

योग्य उम्मीदवारों को यह सम्मान न मिलने से इन पुरस्कारों का अवमूल्यन हो रहा है। यह महसूस किया जा रहा है कि इन पुरस्कारों के चरित्र में परिवर्तन हो रहा है। इन पुरस्कारों को देने की प्रक्रिया में सार्वजनिक सेवा के विचार जैसा कोई आधार नहीं है। यदि आने वाले समय में हम इन पुरस्कारों के चयन के आधार को निष्पक्ष नहीं बना सके, तो अपने आपसे पूछने की जरूरत है कि इन पुरस्कारों को जारी रखने की क्या आवश्यकता है?





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