संपादकीय. तमाम लंबे-चौड़े दावों के बावजूद हम स्कूली शिक्षा को अभी तक न तो सर्वसुलभ बना सके हैं और न ही उसे मानवीय स्पर्श दे पाए हैं। किसी देश की प्रगति का पहला पैमाना वहां की शिक्षा व्यवस्था होती है, जिसकी बुनियाद मूलत: स्कूली शिक्षा होती है। लेकिन तमाम लंबे-चौड़े दावों के बावजूद हम अपनी स्कूली शिक्षा को अभी तक न तो सर्वसुलभ बना सके हैं और न ही उसे मानवीय स्पर्श दे पाए हैं।
यह सही है कि पिछले कुछ वर्षो में शिक्षा के लिए बजट का अंशदान बढ़ा है और इसका सबसे बड़ा हिस्सा स्कूली शिक्षा को ही समर्पित है, लेकिन हकीकत यह है कि स्कूली शिक्षा की हालत दयनीयता के दायरे से बाहर नहीं निकल पा रही है। आज भी पहली से लेकर दसवीं कक्षा तक आते-आते स्कूल छोड़कर जाने वाले बच्चों की संख्या का आंकड़ा ६३ प्रतिशत के भयावह सूचकांक पर अड़ा हुआ है।
पिछले दिनों नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन के एक सर्वेक्षण में यह पता चला कि इस देश के ४२ हजार स्कूल ऐसे भी हैं, जिनका अपना कोई भवन ही नहीं है। जब बैठने तक के लिए भवन नहीं हैं तो सीखने-सिखाने के अन्य उपकरणों और शेष शैक्षिक प्रक्रियाओं की बात करना ही बेमानी है।
यही नहीं यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के स्कूल जाने वाले बच्चों में ४क् प्रतिशत बच्चे अंडरवेट होते हैं और लगभग ४२ प्रतिशत कुपोषण की श्रेणी में आते हैं। ये आंकड़े चौंकाते नहीं, हताशा पैदा करते हैं और ‘दोपहर का भोजन’ जैसी हमारी सरकारी स्कीमों को मुंह चिढ़ाते हैं।संचार टेक्नोलॉजी के तीव्र विकास के दौर में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दूरस्थ और वचरुअल शिक्षा की बात चाहे जितनी जोर-शोर से की जा रही हो, लेकिन स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में प्रशिक्षित और निष्ठावान शिक्षक की भूमिका का कोई विकल्प नहीं है। पिछले चार सालों में अपने यहां शिक्षक प्रशिक्षण की संस्थाएं तीन हजार से बढ़कर आठ हजार हो गई है, पर इन संस्थाओं में भी योग्य प्रशिक्षकों का अकाल है, इसलिए प्रशिक्षण के नाम पर सिर्फ खानापूरी ही ज्यादा हो रही है।
बिना योग्य अध्यापक के एक संवेदनशील, रचनात्मकता से भरपूर और मौलिक प्रतिभा वाला शिक्षार्थी विकसित कर पाना कठिन है। आज जब भारत तेजी से विकसित हो रहे देशों की श्रेणी में शामिल होने की होड़ में है, तब स्कूली शिक्षा की नींव मजबूत करने की जरूरत को कम नहीं समझा जा सकता।