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Chandigarh Chandigarh जालंधर.पठानकोट बाईपास पर गुरु गोबिंद सिंह एवेन्यू में बने सूर्य एन्क्लेव का गेट दिल्ली के जंतर-मंतर की तरह समय का अनुमान बताता है। 12 मार्च 2006 को चौधरी जगजीत सिंह ने इसका उद्घाटन किया था। करीब २क् लाख रुपए की लागत से बनाए गए इस गेट का उद्देश्य लोगों को उस जमाने में टाइम जानने के साइंटिफिक तरीके की जानकारी देना था, लेकिन आश्चर्य की बात है कि सिटी के लोग इससे अंजान है।
अधिकतर लोगों को तो पता ही नहीं सिटी में ऐसा कोई गेट बनाया गया है। इसकी देखरेख करने वाले बताते हैं उदघाटन के बाद से इसमें कई चेंजेस होने थे, लेकिन किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। न तो इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट को इसका ख्याल आया और न ही प्रसाशन को।
इसे बनाने वाले कांट्रैक्टर गुरदेव सिंह ने बताया इसको बनाने में छह महीने लगे थे। इसका मकसद था कि स्कूली बच्चे देखने आएंगे और इससे इतिहास को समझेंगे। वह मकसद तो पूरा नहीं हुआ बल्कि अनदेखी के कारण यह असामाजिक तत्वों का अड्डा बनता जा रहा है।
मिलकर बनाई योजना
उस समय इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के सुपरिंटेंडेंट रहे मुकुल सोहनी ने बताया हमने मिलकर यह निर्णय लिया था कि दिल्ली और जयपुर की तरह सिटी में भी जंतर-मंतर बनाया जाना चाहिए। जिससे सिटी के बच्चों को इसकी जानकारी दी जा सके। हमने इसके लिए आर्किटेक्ट कंपीटीशन भी करवाया था। जिसमें दिल्ली के एवी आर्किटेक्ट ने इसे बनाने का दावा किया और उसी ने इसका निर्माण किया था।
पहले स्टडी कीदिल्ली के एवी आर्किटेक्ट के ऑनर वरिंद्र पाल सिंह ने बताया जब इस सोलर क्लॉक का नक्शा तैयार करने के कंपीटीशन के बारे में सुना तो मैं भी इसमें पार्टीसिपेट करने जालंधर पहुंचा। जब मैंने इसका नक्शा तैयार करने के लिए प्रस्ताव रखा तो मदद के लिए कोई आगे नहीं आया।
इसका नक्शा तैयार करने में बहुत सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इसके लिए हमने पहले दिल्ली और जयपुर के जंतर-मंतर को स्टडी किया। यह मॉडर्न जमाने का पहला सोलर क्लॉक है। जिस दिन यह कंप्लीट हुआ तो हमें बहुत खुशी हुई। जो सोचा था जैसा सोचा था तैयार कर दिया।
इस तरह पता चलता है समय गुरदेव सिंह ने बताया यह धूप के साथ समय की जानकारी देता है। इसी तरह रात में जब हम दक्षिण की तरफ मुंह कर देखते हैं तो उत्तर की तरफ बनी खिड़की से ध्रुव तारा नजर आता है। इसके दूसरे गेट पर बारह राशियों के चिन्ह भी बनाए गए हैं।
इसमें इस्तेमाल किए गए रंग भी वही हैं जो बारिश के बाद रेनबो में नजर आते हैं। उन्होंने बताया इस पर जो निशान लगाए गए हैं वो तीन साल पहले के हैं। इस पर लगे लोहे को धीरे-धीरे लोग उखाड़ कर ले जा रहे हैं, जिससे इसकी उपयोगिता खत्म होती जा रही है।