पिछले डेढ़ दशक से समकालीन हिंदी कथा परिदृश्य का खासा बड़ा प्रतिशत फामरूलों की चपेट में है। एक से एक हिट नायाब फामरूले। जब यह बात उठाई जा रही है तो प्रतिवाद में तर्क-विर्तक किया जा सकता है कि फामरूलाबद्धता साहित्य में कब नहीं थी?
विधवा जीवन को कथ्य का विषय बनाया गया तो अन्य लेखकों को भी विधवा जीवन की त्रासदी की पीर उठने लगी। पीर उठी तो लगा कि उसे उठना ही चाहिए था। क्योंकि कूप मंडूक भारतीय समाज में पति के न रहने पर उसके बुनियादी अधिकारों से उसे बेदखल कर जिस तरह का अकल्पनीय तिरस्कृत अमानवीय जीवन स्त्री को जीना पड़ता था - उसके विरुद्ध कलम को आवाज उठानी ही चाहिए थी लेकिन अनुभवों के अन्य क्षेत्रों का खनन करने में भी कलम कुदाल सी कमी पीछे नहीं रही।
आज स्थिति पूर्वापेक्षा भिन्न है। लेखक अपने अनुभवों के दायरे का अतिक्रमण नहीं कर पा रहा। अनुभवों के नाम पर उसके पास मात्र उसके गांव घर की स्मृतियां भर हैं। या उस या इस शहर का निजि संघर्ष।
वह अमृतलाल नागर की भांति ‘खंजन नयन’ लिखने के लिए सूरदास की ब्रज भूमि में जाकर डेरा डाल उनके जीवन की कल्पना नहीं करता। राघेय राघव की तरह नरों के बीच जाकर जीवन का कुछ समय उनके साथ नहीं गुजारता। वह अनुभव का क्षेत्र बढ़ाना भी चाहता तो विशेषज्ञता के लिए पुस्तकों का सहारा ले लेता है और सुविधा हुई तो उस क्षेत्र की परिक्रमा कर कुछ होमर्वक बोली बानी का कर लेता है।
बहुत अरसे बाद गिरिराज किशोर का उपन्यास ‘पहला गिरमिटिया’ उनके लेखकीय जुनून का प्रतिफल है - होमवर्क के बावजूद। उन्होंने उन जगहों को देखने समझने का गहन प्रयास किया जिस आकाश के नीचे मोहनदास करमचन्द गांधी ने मनुष्य की आजादी का सपना देखा! क्या लेखक ने लेखकीय जुनून को जीना छोड़ दिया है? फमरूलाबद्ध लेखन साहित्यजगत के लिए चिंता का विषय है।