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इस दौड़ती-भागती जिंदगी में जरूरत है हमदर्दी की

हालीवुड फिल्म ‘वॉल स्ट्रीट’ में गोर्डन गेको के विपरीत मुझे लोभ बिलकुल भी पसंद नहीं है। लेकिन मैं उसे भी नजरअंदाज करने को तैयार हूं बशर्ते जब तक उसके साथ दूसरों के प्रति हमदर्दी भी जुड़ी रहे। दुनिया के धूर्त, दुष्ट और महाभ्रष्ट तानाशाहों ने मदर टेरेसा को परोपकार की भावना से बड़ी-बड़ी धनराशि जनकल्याण के लिए दी।

उन्हें लगता था कि इससे उनकी दागदार छवि की भरपाई हो सकती है। ऐसा हुआ भी। दूसरी तरफ मदर को उनसे जो धन प्राप्त हुआ उससे उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी और सफल चैरिटी की स्थापना की, जो दुनिया भर के बीमार और जरूरतमंद लोगों की मदद कर रही है।

चैरिटी की यह भावना यहां देखने में नहीं आती। अगर है भी तो वह प्रत्यक्ष नहीं है। सही है कि ढेर सारी नकदी और आभूषण भक्तजनों द्वारा मंदिर में गुप्तदान के तौर पर छोड़ दिए जाते हैं लेकिन यहां के धनकुबेर बिल गेट्स या वॉरेन बफे की तर्ज पर स्थानीय एनजीओ द्वारा किए जा रहे उल्लेखनीय समाज कल्याण के कार्यो को आर्थिक मदद पहुंचाते नजर नहीं आते।

गौरतलब यह है कि जॉर्ज सोरोस मुक्त समाज की स्थापना के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रम को धन उपलब्ध कराते हैं तो रिचर्ड गेरे एड्स से जुड़े विभिन्न संगठनों को। इसी तरह बिल क्लिंटन भी समाजसेवा में सक्रिय हैं। इसके विपरीत भारत के रईस-उमराव मंदिर बनवाना उचित समझते हैं, महंगी नौकाएं या पीएचडी की डिग्रियां खरीदते हैं या अपने स्वर्गवासी अभिभावकों के नाम पर शहर और सड़कों के नामकरण में रुचि रखते हैं।

पिछले कई वर्षो में मुंबई की समृद्धि बढ़ी है, लेकिन साथ ही बढ़ी है हमारी निर्दयता भी। बात सिर्फ बिगड़ैल रईसजादों की नहीं है, जो शराब के नशे में धुत फुटपाथ पर सो रहे लोगों पर गाड़ी चढ़ा देते हैं। यह तो बहुत साधारण सी बात है। हाजीअली क्रॉसिंग पर एक बोर्ड लगा है, जो ट्रेफिक लाइट पर मोटर-गाड़ियों के स्वामियों को हॉकर्स से कुछ भी न खरीदने की चेतावनी देता है।

मुझे आश्चर्य हुआ कि आखिर स्थानीय प्रशासन को यह चेतावनी देने की जरूरत क्यों पड़ी? यहां के हाकर्स छोटे-छोटे बच्चे होते हैं, जो फूल, पत्र-पत्रिकाएं बेचते हैं। आखिर उन्हें क्यों कोई रोकना चाहता है? सच तो यह है कि हमें इन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए कि वे चोरी करने या भीख मांगने की बजाय यह काम कर रहे हैं।

सच तो यह है कि भिखारियों के प्रति हमारा रवैया भी अब बदल चुका है। हम लगातार पढ़ते रहते हैं कि किस तरह एक नकली भिखारी ने सहानुभूति अर्जित करने के लिए स्वांग भरा हुआ था। हम यह भी पढ़ते हैं कि उन्होंने कुछ भी न करते हुए कितनी बड़ी धनराशि जुटा ली है। हालांकि मैं इससे विनम्रतापूर्वक अपनी असहमति जताता हूं।

मैं नहीं मानता कि सभी भिखारी फर्जी होते हैं। मुंबई शहर ही में हजारों की संख्या में भिखारी होंगे, जिनके पास आमदनी का कोई जरिया नहीं है। वे आसानी से अपराध की दुनिया की ओर रुख कर सकते हैं। लेकिन इसकी बजाय वे हमसे हमदर्दी की दरकार रखते हैं और भीख मांगते हैं। इनमें से महाराष्ट्र के तमाम ग्रामीण क्षेत्रों के बहुत निर्धन लोग हैं, जो गरीबी की मार से बचने के लिए यहां आ गए।

कुछ सस्ते मजदूर हैं, जिन्हें बिल्डर्स दूसरे राज्यों से यहां काम के लिए लाए और फिर दुत्कार दिया। वे अपनी स्थानीय भाषा के अलावा कोई दूसरी भाषा भी नहीं जानते। ऐसे में जब वे कोई और काम ढूंढ़ने में नाकाम रहते हैं तब भीख मांगना शुरू करते हैं।

इन दिनों मैं बीमार-बूढ़ों को भिखारियों की एक नई प्रजाति के तौर पर देख रहा हूं। ये वे लोग हैं, जिन्हें उनकी ही औलादों ने घर से बेघर कर दिया। युवा पीढ़ी आगे बढ़ने की होड़ में अपने पीछे अभिभावकों को छोड़ देती है, जिनके पास कहीं जाने का कोई विकल्प नहीं होता। यहां तक कि संपत्ति की बढ़ती कीमतों ने तमाम वृद्धाश्रमों को रातोंरात चुपचाप नेस्तनाबूद कर दिया। ऐसे में ये बेघर वृद्ध जाएं तो जाएं कहां? इ

सीलिए इनके पास शर्मिदगी के साथ भीख मांगना ही एक अंतिम विकल्प बचता है। सही है, बहुत से भिखारी फर्जी भी होते हैं, लेकिन भीख मांगने को बतौर पेशा अपनाकर देखिए, आपको समझ आ जाएगा कि कितना श्रमसाध्य और बेगैरत काम है। मुझे शक है कि कोई इसे सोच-समझकर अपनाता होगा। यह तो बढ़ा-चढ़ाकर कहने वाली बात है। कुछ भिखारियों के मरने के बाद उनके पास से लाखों रुपए मिले होंगे, लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि सभी भिखारी लखपति ही होते हैं।

भीख न देने का यह भी एक कारण बताया जाता है। इसके अलावा एक और कारण है कि भिखारी भीख में मिले पैसों को नशे में फूंक देते हैं। सड़क पर रहकर देखिए आपको इस सचाई का भी पता चल जाएगा।

सरकार के अपने आंकड़े बताते हैं कि महाराष्ट्र के निर्धन ग्रामीणों में से महज छह फीसदी को रोजगार गारंटी योजना के तहत 100 दिन का काम मिला। यही ग्रामीण तबका उम्मीदों के साथ मुंबई जैसे बड़े शहरों की ओर रुख करता है और थक-हारकर सड़क पर आ जाता है। और हम उनसे हमदर्दी भी नहीं जता पाते। बड़े शहर शायद यही स्वार्थ हमें दे रहे हैं।





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