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यथास्थिति और यथार्थ

अभिमत. जब अमेरिका ब्याज दरों में लगातार कटौती कर रहा हो, तब भारत जैसे देश को क्या करना चाहिए? जब डॉलर का प्रवाह तेजी से भारत चला आ रहा हो, पेट्रोलियम की कीमतें 92 डॉलर प्रति बैरल चल रही हों और खाद्य पदार्थो की कीमतों में इजाफे की आशंकाएं हों तब रिजर्व बैंक को क्या करना चाहिए?

पहले सवाल का जवाब है कि भारत को भी ब्याज दरों में कमी करनी चाहिए, तो दूसरे सवाल का जवाब गवर्नर वाईवी रेड्डी ने मंगलवार को दे दिया है। रेड्डी ने एकदम सही मसला उठाया है कि आखिर भारत आने वाले पूंजी प्रवाह की कोई स्पष्ट नीति होनी चाहिए। आखिर रिजर्व बैंक अमेरिकी ब्याज दरों में कटौती से कब तक संघर्ष करता रहेगा? सरकार को पूंजी प्रवाह पर नियंत्रण के दूसरे औजार भी इस्तेमाल करने चाहिए। रेड्डी लंबे समय से डॉलर के प्रवाह को काबू में करने के लिए तमाम उपाय करते आ रहे हैं।

अब अमेरिका ब्याज दरों में एक और कटौती करता है तो भारत को पूंजी प्रवाह पर नियंत्रण के कड़े उपाय करने होंगे। जानकार अब भी कह रहे हैं कि मैन्युफैक्चरिंग और टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं के उद्योग की हालत और बिगड़ती है, तो रिजर्व बैंक को ब्याज दरों से ही सहारा देना होगा। रेड्डी ने कहा भी है कि रोजगार बढ़ाने वाले क्षेत्रों को बैंक ज्यादा कर्ज दें।

रेड्डी ने कोई कदम नहीं उठाते हुए भी भविष्य में कदम उठाने की तैयारी की है। अमेरिका से खबरें आ रही हैं कि वह ब्याज दरों को मुद्रास्फीति से भी नीचे ले जाना चाहता है, जो करीब 2.5-3 फीसदी के आसपास कहीं हो सकती है, तब रेड्डी के लिए भारतीय मुद्रा का प्रबंधन करना काफी मुश्किल काम होगा। रुपया अब और मजबूत होकर उभर सकता है। विप्रो के चेयरमैन अजीम प्रेमजी रुपए के असर को ज्यादा ही प्रचारित बता रहे हैं, लेकिन हर कोई जानता है कि अगली तिमाहियां आईटी कंपनियों के लिए आसान नहीं होंगी।





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