दृष्टिकोण. पाकिस्तानी परमाणु हथियारों के जेहादी संगठनों तक पहुंच की आशंका के मद्देनजर परमाणु हथियारों की सुरक्षा का मुद्दा पुन: वैश्विक चिंता का विषय बन गया है। इसी वजह से पाकिस्तान की परमाणु कमान और कंट्रोल डिवीजन के लेफ्टिनेंट जनरल(रिटायर्ड) खालिद किदवई ने २६ जनवरी को एक अभूतपूर्व प्रेस वार्ता कर इस संबंध में उठ रही चिंताओं को दूर करने की कोशिश की, पर ये चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं।
पूरी दुनिया में परमाणु हथियारों का प्रबंधन करना एक बहुत ही जटिल मसला है क्योंकि जो देश परमाणु हथियारों से संपन्न हैं वे इस प्रबंधन को बहुत ही गोपनीय रखना चाहते हैं और इस संबंध में कुछ भी सार्वजनिक नहीं करना चाहते।
इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका के परमाणु हथियारों की व्यवस्था से जुड़ी चार सर्वाधिक सम्मानित हस्तियों ने पूरे विश्व को परमाणु हथियारों से मुक्त करने का आह्वान दोहराया है। पूरे विश्व को परमाणु हथियारों से मुक्त करने के आह्वान के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के साथ हेनरी किसिंजर, जॉर्ज शुल्ज, विलियम पेरी और सैम नन ने इस बात की पुन: वकालत की है कि वह समय आ गया है जब विश्व समुदाय को अपने परमाणु हथियारों को नष्ट करने की घोषणा करनी चाहिए।
उन्होंने जनवरी 2007 में भी यही बात कही थी। भारत की दृष्टि से यह एक बहुत अच्छी पहल है। पचास के दशक में जवाहरलाल नेहरू के समय से ही नई दिल्ली परमाणु हथियारों के निरस्त्रीकरण की वैश्विक मुहिम का अगुआ रहा है। १९८८ में भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी पूरे विश्व को परमाणु हथियारों से मुक्त करने की एक ऐसी ही महत्वाकांक्षी योजना संयुक्त राष्ट्र की महासभा में पेश की थी।
उसे राजीव गांधी एक्शन प्लान के नाम से जाना जाता है लेकिन इस आदर्शवादी और बेहद वांछनीय उद्देश्य पर शीत युद्ध के दूसरे दौर के उत्कर्ष के समय में चर्चा शुरू हो गई थी। उस समय पूर्व सोवियत संघ का बिखराव नहीं हुआ था और परमाणु निषेध की बात करना बहरे कानों में तूती की आवाज के मुहावरे को चरितार्थ करने जैसा था।
उस समय से परमाणु हथियारों के परिदृश्य को लेकर दुनिया में काफी कुछ घट चुका है। इस बीच, एक भी परमाणु हथियार दागे बगैर शीत युद्ध समाप्त हो गया, सोवियत संघ बिखर गया और सोवियत संघ के सारे परमाणु हथियार रूस के नियंत्रण में आ गए। हालांकि सोवियत संघ के बिखराव के पहले इनमें से कुछ यूक्रेन और कजाकिस्तान में तैनात थे।
नतीजतन, आज भी विश्व में परमाणु हथियार संपन्न देशों की बिरादरी में पांच ही देश शामिल हैं। इसके बावजूद, मई १९९८ में पहले भारत और फिर पाकिस्तान ने एनपीटी के दायरे से बाहर रहते हुए भी अपने को परमाणु हथियारों से सम्पन्न राष्ट्र घोषित किया, इससे पहले से ही परमाणु हथियारों से संपन्न देशों को तेज झटका लगा। फिर ११ सितंबर, २क्क्१ की विध्वंसक घटना के बाद इराक, ईरान, उत्तर कोरिया जैसे देशों और विभिन्न आतंकवादी संगठनों तक परमाणु हथियारों के पहुंचने की आशंका को देखते हुए परमाणु हथियार संपन्न देशों की चिंता और बढ़ गई है।
पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के जनक एक्यू खान के गोपनीय परमाणु नेटवर्क के रहस्योद्घाटन ने वर्षो से परमाणु विशेषज्ञों और विश्लेषकों द्वारा व्यक्त की जा रही चिंता को ही सही साबित किया है। इस नेटवर्क को ‘ग्लोबल न्यूक्लियर वॉल-मार्ट’ के नाम से भी जाना जाता है।
किसिंजर और अन्य हस्तियों ने परमाणु हथियारों पर रोक लगाने के लिए ताजा पहल ऐसे समय की है जब परमाणु हथियारों और उनसे संबंधित तमाम सामग्री की सुरक्षा वास्तविक वैश्विक चिंता का विषय बन चुकी है लेकिन इस बेहद वांछित उद्देश्य को जल्दबाजी में हासिल किया जाना संभव नहीं लगता है। पूरे विश्व के ९५ प्रतिशत परमाणु हथियार अमेरिका और रूस के पास हैं। इन दोनों देशों का कहना है कि उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा उनके परमाणु हथियार के भंडार से गहराई से जुड़ी हुई है।
जाहिर है कि वे अपने परमाणु हथियारों को समाप्त करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखते हैं। इसका प्रभाव यह हुआ है कि ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, भारत और पाकिस्तान जैसे परमाणु हथियार कीकम क्षमता रखने वाले देश भी अपने परमाणु हथियारों को छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
यह एक और निराशाजनक संकेत है कि अमेरिका और रूस अब छोटे और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण परमाणु हथियारों के विकास में जुटे हुए हैं। संकेत साफ हैं कि परमाणु हथियारों के खात्मे की बजाय उनकी प्राथमिकता इन्हें और भी परिष्कृत रूप में विकसित करना है और इस काम पर वे भारी धनराशि खर्च भी कर रहे हैं।
ऐसे में यह आम धारणा निराधार लगती है कि परमाणु हथियार संपन्न प्रमुख देशों का परमाणु हथियारों का भंडार अनुपयोगी हो चुका है और इसका इस्तेमाल केवल राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा सकता है। किसिंजर की ताजा पहल के बाद गैर-सरकारी विशेषज्ञों का एक वैश्विक सम्मेलन फरवरी माह में ओस्लो में होने जा रहा है जिसमें परमाणु हथियारों से संबंधित विभिन्न प्रस्तावों-सुझावों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।
लंबे समय तक परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रयासों के प्रबल समर्थक रहे भारत की आवाज पिछले कुछ वर्षो में धीमी पड़ गई है। हालांकि वह संयुक्त राष्ट्र महासभा में हर साल परमाणु निरस्त्रीकरण की बात दोहराता है, मगर 1998 के पोकरण-2 के बाद से उसकी आवाज में पहले जैसा वजन नहीं रह गया है।
भारत को अपने बारे में विश्व की यह अवधारणा बदलने की कोशिश करनी चाहिए। याद रहे कि रासायनिक हथियारों पर प्रतिबंध के बारे में 1925 में स्वीकृत जिनेवा कन्वेंशन पर सहमत होने में वैश्विक बिरादरी को 71 साल लग गए थे। परमाणु हथियारों पर पूरी तरह रोक लगाए जाने की मुहिम तो अभी शुरू ही हुई है।
-लेखक रक्षा विश्लेषक हैं।