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एक फंसी हुई ‘डील’

संपादकीय. भारत में अमेरिका के राजदूत डेविड सी. मलफोर्ड ने एक बार फिर कहा है कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित परमाणु करार यदि बुश प्रशासन के रहते संपन्न कर लिया जाता तो अच्छा होता, वरना अगले दो सालों तक इसके टल जाने की आशंका है।

मलफोर्ड जानते हैं कि मौजूदा भारत सरकार और अमेरिकी सरकार दोनों दिल से यह चाहते हैं कि डील हो जाए। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि मनमोहन सिंह सरकार को अपने समर्थन पर टिकाए रखने वाले वामदलों ने इस डील के विरुद्ध अवरोधों का जो पहाड़ खड़ा कर रखा है, उसे लांघ पाना प्रधानमंत्री के लिए फिलहाल मुश्किल है। ऐसे में अमेरिकी राजदूत की सदिच्छात्मक अपीलों का सिर्फ नैतिक महत्व है।

अमेरिका और भारत दोनों तरफ से इस डील को अंजाम तक पहुंचाने में जुटे योद्धा एक-एक करके मैदान छोड़ रहे हैं। निकोलस बर्न्‍स अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं। अमेरिका में भारत के राजदूत रोनेन सेन अपने तीसरे सेवा विस्तार के बाद ३१ मार्च को रिटायर हो रहे हैं।

डील के पक्ष में असाधारण उत्साह दिखाने वाले सेन को अपने बड़बोलेपन के लिए भारतीय संसद तक में पेश होना पड़ा था। स्वयं मलफोर्ड का भारत में राजनयिक कार्यकाल भी अमेरिका में नई सरकार आने तक ही शेष है। ऐसे में परमाणु डील को एक दुखांत नाटक की तरह ही देखना होगा। इसकी एक वजह यह भी है कि हाल-फिलहाल इस पर विद्यमान गतिरोध दूर होते नहीं दिखता।

वैसे भी अमेरिका इन दिनों अपने चुनावी झंझावातों में फंसा हुआ है और ज्यादा संभावना इस बात की है कि वहां के अगले प्रशासन पर रिपब्लिकन की बजाय डेमोक्रेट्स का नियंत्रण हो। भारत भी अगले आम चुनावों की दहलीज पर खड़ा है और सभी पार्टियां अपनी-अपनी चुनावी रणनीतियां बनाने में व्यस्त हैं।

इन रणनीतियों का एक हिस्सा गठबंधन राजनीति भी है, जो सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए फिलहाल पेशानी पर बल डालने वाली साबित हो रही है। बुश प्रशासन की विदेशनीति की उपलब्धियों के तौर पर इस परमाणु डील का भले कुछ राजनीतिक महत्व हो, पर भारतीय मतदाताओं के बीच यह कोई मुद्दा नहीं हो सकता।

इसलिए इस संदर्भ में रह-रहकर अमेरिका की ओर से उठने वाले नैतिक दबावों और भारतीय हुक्मरानों की बेबस उदासीनता को समझना मुश्किल नहीं है। यह एक फंसी हुई डील है। फिर भी यदि इस बहाने दोनों पक्ष अपनी-अपनी नेकनीयत का इजहार करते रहें तो बुरा क्या है।





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