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नहीं बिके ‘वीआईपी’

इंदौर. आय बढ़ाने के लिए घोषित किए गए वीआईपी नंबर अब परिवहन विभाग के लिए परेशानी बन गए हैं। इससे आय तो बढ़ी लेकिन आधे नंबर खाली रहने लगे। अब विभाग इन्हें कम करने की तैयारी कर रहा है। आय बढ़ाने के लिए सन् 2001 में हर सिरीज में 398 नंबर वीआईपी कर दिए गए। ये नंबर आवेदक द्वारा निर्धारित फीस जमा करवाने पर ही दिए जाने लगे।

1 से 9 तक के नंबर तो लोग ले लेते हैं लेकिन इसके बाद के ज्यादातर नंबर खाली रह जाते हैं। इंदौर सहित प्रदेश के कई आरटीओ में ऐसे करीब ढाई सौ नंबर खाली पड़े हैं। मंगलवार को भोपाल में परिवहन मंत्री हिम्मत कोठारी ने बीते वर्षो में खाली रहे वीआईपी नंबर को इस श्रेणी से हटाने की बात कही थी। वहीं भास्कर से चर्चा में परिवहन आयुक्त एन.के. त्रिपाठी ने भी वीआईपी नंबर कम करने की बात कही।

पांच शहरों में ही 50 हजार

परिवहन विभाग के अधिकारियों की मानें तो इंदौर में 15 हजार से ज्यादा और जबलपुर, भोपाल, सागर व ग्वालियर में करीब 35 हजार से ज्यादा वीआईपी नंबर खाली हैं।

2001 से हुए वीआईपी

15 फरवरी, 01 को गजट में वीआईपी नंबरों की सूची प्रकाशित होने के बाद हर सिरीज में करीब 398 नंबर वीआईपी सूची में आए।

आरटीओ से मिली जानकारी के अनुसार इंदौर में एम.पी. 09 जे.आर. 0786 नंबर की पहली रसीद कटी थी।

आरटीओ में 786 नंबर खासी परेशानी का कारण बनता है। 0786 तो पेड नंबर है इसे तो पैसा देकर लोग ले लेते हैं लेकिन एक सिरीज में दस बार आने वाला यह नंबर भले ही वीआईपी नहीं हो लेकिन यह कर्मचारियों के लिए परेशानी का कारण बनता है।





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