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वाकी-टाकी का बोरा नाले में मिला

रायपुर. r महादेवघाट से भाठागांव मार्ग पर स्थित चिंगरी नाले में बुधवार की सुबह पुलिस ने वाकी-टाकी से भरा बोरा बरामद किया। लो फ्रिक्वेंसी के सैट का इस्तेमाल आमतौर पर बड़े भवनों में सुरक्षा अधिकारी करते हैं। पुलिस को शक है, इसके पीछे भी नक्सलियों का हाथ हो सकता है। बहरहाल डीडीनगर पुलिस मामले की जांच कर रही है।

पुलिस के अनुसार सुबह 9.30 बजे शौच के लिए नाला आए एक ग्रामीण ने वहां बोरा पड़ा देखा। उन्होंने इसकी सूचना पुलिस को दी। लावारिस बोरा मिलने की सूचना से अफसर भी हड़बड़ा गए। बम डिस्पोजल दस्ते के साथ फोर्स वहां पहुंची और सावधानी से बोरे को बाहर निकाला। बोरे में 23 नग मोटोरोला कंपनी के वाकी-टाकी सैट के अलावा पांच चार्जर और फ्यूज वायर के चार बंडल निकले।

एक बंडल में 50 से अधिक फ्यूज वायर हैं। इनका इस्तेमाल कनेक्टिविटी के लिए और विस्फोटकों में किया जाता है। डायरी और अखबार की रद्दी भी बोरे में थी, पुलिस इसका इस्तेमाल क्लू के रूप में करेगी। सिटी एसपी डा. लालउमेद सिंह, एएसपी ट्रैफिक जीएस ठाकुर, सीएसपी आईएच खान समेत कई पुलिस अफसर दिनभर डीडीनगर थाने में बैठकर इसकी गुत्थी सुलझाते रहे।

बोरा जिस नाले में मिला, वह चंद्रहास कृषि फार्म के करीब है। फार्महाउस के मालिक सुंदरनगर निवासी चंद्रहास पांडे हैं। उनसे भी इस बारे में पूछताछ होगी। अफसरों का मानना है, शहर में नक्सलियों का नेटवर्क फूटने और धड़ाधड़ गिरफ्तारियों से डरे लोगों ने ही बोरे को ठिकाने लगाया है।

संभव है, इसकी सप्लाई नक्सलियों को की जानी थी। यह भी हो सकता है कि संदेह के दायरे से बाहर निकलने सुरक्षा एजेंसियों या इसका ढके-छिपे रूप में कारोबार करने वालों ने इसे फेंका हो।

नए सैट, रेंज कम

नाले में बरामद वाकी-टाकी सैट नए हैं। बोरे में इसके इस्तेमाल से संबंधित निर्देशिकाएं भी थीं। पुलिस का कहना है, सैट से भरा बोरा एक-दो दिन पहले ही फेंका गया हो सकता है। ज्यादा दिनों से पानी में होता तो सैट खराब हो चुके होते। इसका रेंज कम है।

अफसर इस बात का पता लगा रहे हैं कि अगर यह नक्सलियों तक पहुंचता तो इसका किस तरह से इस्तेमाल होता। गौरतलब है, कुछ दिनों पहले सुंदरनगर-डगनिया तिराहे पर लावारिस बैगों में 90 कट्टों के साथ वायरलैस सैट मिले थे। इसके तार सीधे नक्सलियों से जुड़े हुए हैं। महिला नक्सली, सप्लायर समेत पांच लोग धरे जा चुके हैं।

पुलिस को उलझाने की कोशिश

बेंगलूर से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ‘द हिंदू’ की रद्दी का इस्तेमाल वाकी-टाकी की पैकिंग में किया गया है। 2 और 3 जनवरी के अलावा 26 दिसंबर तथा 29 दिसंबर 2007 को प्रकाशित अखबार साबूत हालत में मिले हैं। 2008 की एक डायरी भी मिली है, जो पूरी तरह कोरी है। माना जा रहा है, पुलिस को उलझाने के लिए ही बाहर के अखबार की रद्दी का इस्तेमाल किया गया है।

रेडियो शाखा में होगा परीक्षण

सिटी एसपी डा. लाल उमेद सिंह ने बताया कि वाकी-टाकी की रेंज और उसके तकनीकी पक्षों की विस्तृत विवेचना के लिए मामला पुलिस की रेडियो शाखा को सौंपा दिया गया। वाकी-टाकी के इस्तेमाल के बारे में अभी तक अफसर दावे से कुछ भी नहीं कर रहे हैं, लेकिन माना जा रहा है कि इनका इस्तेमाल नक्सली अपने छोटे ग्रुप में संपर्क बनाए रखने के लिए करते हों।





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