भोपाल.
राजधानी के कोलार के आसपास प्राचीन शैलचित्रों के खजाने को संरक्षित करने की पहल शुरू हो गई है। पुरातत्ववेत्ताओं का दावा है कि इस क्षेत्र में मिले शैलचित्रों की तादाद प्रदेशभर में सबसे ज्यादा है। इनमें से कई चित्र भीमबैठिका के चित्रों से भी बेहतर हालत में हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की कोशिश इसे राष्ट्रीय धरोहर में शामिल कराने की है।
मंगलवार को एएसआई के अधिकारियों ने इस क्षेत्र का दौरा किया। यह पुरातत्व संपदा कोलार से करीब 20 किलोमीटर दूर कठौतिया गांव के पास 15 किलोमीटर दूर तक की पहाड़ियों में बिखरी हुई है। इसके अलावा झिरी गांव की पहाड़ियों में लगभग दो किलोमीटर तक चट्टानों में गेरुए और सफेद रंग के अनगिनत शैलचित्र हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह शैलचित्र दस से पंद्रह हजार वर्ष पुराने हो सकते हैं और भीमबैठिका के चित्रों से भी अच्छे हैं। लेकिन संरक्षण और प्रचार-प्रसार के अभाव में जनसामान्य में इसके बारे में पर्याप्त ज्ञान नहीं है। पुरातत्ववेत्ताओं का दावा है कि देश भर में मप्र में सबसे ज्यादा शैलचित्र मिले हैं। बताया जा रहा है कि प्रदेश में भी अभी तक की खोज का साठ प्रतिशत शैलचित्र इन्हीं गांवों के आसपास मौजूंद हैं।
कठौतिया गांव यहां की पहाड़ियों में पैंतीलीस शैलाश्रय हैं, जो लगभग पंद्रह किलोमीटर की दूरी तक फैले हैं। यहां साठ से अधिक शैलचित्र हैं। ये खासकर मध्याश्म और ताम्राश्म युगीन हैं। इनमें विभिन्न मानवाकृतियां, पशु चित्र व आखेट आदि को चित्रित किया गया है।
मध्याश्म युगीन चित्रों में कलात्मक ढंग से जंगली भैंसों के शरीर को ज्यामितिक शैल से अलंकृत किया गया है। सफेद रंग से बने चित्र भी हैं, जिसमें घुड़सवार तथा युद्ध के दृश्य प्रमुख हैं। यहां चट्टानों पर उस युग में प्रयुक्त होने वाली विभिन्न मानवनिर्मित वस्तुओं के चित्र भी हैं।
झिरी गांव यहां कोलार फिल्टर प्लांट की दरई ओर पहाड़ियों में लगभग दो किलोमीटर तक शैलचित्र दर्शनीय हैं। इनमें ताम्राश्म युग की झलक देखने को मिलती है, जिसमें नीलगाय, बारहसिंगा, हिरण व मुखौटा लगाए युद्ध करते हुए लोग शामिल हैं। हरे रंग में युद्ध के दृश्य भी नजर आते हैं। इसके अलावा घुड़सवार शिकारी व राजा की शोभायात्रा का चित्र लगभग पांच हजार वर्ष पहले का बताया जाता है।
इसी श्रंखला में छह फिट के दो व्यक्तियों को युद्ध करते दिखाया गया है। ये लगभग दो हजार वर्ष पुराने हैं। पंचतंत्र के कथा प्रसंगों से मिलते-जुलते चित्र भी हैं, जिसमें शेर और बैल आमने-सामने हैं। किताबों में जिक्र- कठौतिया गांव के शैलचित्रों के बारे में पुरातत्ववेत्ता इरविन न्यूमेयर ने अपनी पुस्तक ‘लाइन आन स्टोन दि प्रिहिस्टोरिक राक आर्ट आफ इंडिया’ में विस्तार से बताया है।
इस पुस्तक में दी गई जानकारियों को एएसआई के सर्वे का आधार बनाया गया है। व्यक्तिगत स्तर पर इसका अध्ययन प्रो. शंकर तिवारी तथा पुरातत्ववेत्ता इरविन ने भी किया है। अब एएसआई इन चित्रों को राष्ट्रीय धरोहर में शामिल करने के लिए दिल्ली स्थित मुख्यालय को भेजने वाला है।
इनका कहना है..
-इन शैलचित्रों को संरक्षित कर लिया गया तो यह स्थान पर्यटन के रूप में विकसित हो सकता है। विंध्याचल की पहाड़ियों में और शैलचित्र मिलने की उम्मीद है।
-डा. नारायण व्यास, अधीक्षण पुरातत्वविद्, टेम्पल सर्वे प्रोजेक्ट नार्थ रीजन, एएसआई।
-कठौतिया और झिरी गांव में सर्वे हुआ है। इन शैलचित्रों को संरक्षित करने के लिए जल्द ही एक प्रस्ताव दिल्ली मुख्यालय भेजा जाएगा।
- केके मोहम्मद, पुरातत्व अधीक्षक, एएसआई।