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खर्चा डेढ़ गुना, आधों को भी नहीं मिला पानी

जयपुर. जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग पिछले चार साल से केवल बजट खर्च करने में ही जुटा रहा। पिछली सरकार के मुकाबले इस सरकार में इंजीनियरों ने खर्चा तो डेढ़ गुना कर दिया, लेकिन पीने का पानी आधे गांव और ढाणियों तक भी नहीं पहुंचा। हाल ही राज्य सरकार की ओर से चार साल की उपलब्धियों को लेकर जारी आंकड़ों से यह खुलासा हुआ है।

विभागीय इंजीनियर अब यह दलील दे रहे हैं कि पिछले पांच सालों में महंगाई तो बढ़ी ही है, साथ ही जनसंख्या का दबाव भी बढ़ा है। इसलिए खर्चा तो ज्यादा होगा ही। जबकि सूत्रों का कहना है कि विभाग में पानी की गुणवत्ता और लागत कम करने से ज्यादा बजट खर्च करने पर जोर दिया जाता रहा है। इसका नतीजा यह रहा कि इंजीनियरों ने बजट खर्च करने के लिए जोरशोर से पाइप और अन्य सामानों की खरीद शुरू कर दी। फील्ड में एईएन, जेईएन नहीं होने से न तो प्रोजेक्टों की प्रभावी मॉनीटरिंग हो पाई और न ही ठेकेदारों पर अंकुश रह पाया है। विभाग में इस समय एईएन, जेईएन के लगभग 250 पद खाली चल रहे हैं।

विभाग के मुख्य अभियंता (ग्रामीण) एम. के. एम. जोशी का कहना है कि पिछली सरकार में जो जल योजनाएं शुरू की गई थीं, उनमें अधिकांश का जल स्रोत भूमिगत था और नजदीक होने से कम लागत में ज्यादा लोगों तक पानी पहुंचाया जा सका। अब भूमिगत जल स्तर लगातार नीचे जाने से ज्यादातर जल स्रोत सूख गए हैं अथवा वहां पानी ही नहीं रहा। मजबूरन भू-जल स्तर वाले स्रोतों बांध, नहरों से पीने का पानी सप्लाई करना पड़ा है। जब दूर से पानी लाना पड़ेगा तो लागत ज्यादा आएगी और कम लोगों तक पानी पहुंचेगा।

पेयजल व्यवस्था की तुलनात्मक स्थिति
कांग्रेस सरकार में ( वर्ष 1998 से 2003 तक)
* 2500 करोड़ रुपए का कुल खर्चा हुआ
* 6223 गांव और ढाणियों में पूर्ण रूप से पानी की व्यवस्था हुई
* 41,436 गांव और ढाणियों में आंशिक रूप से पानी पहुंचाया गया।

भाजपा सरकार में (वर्ष 2003 से 2007 तक )
* 3800 करोड़ रुपए का कुल खर्चा (चार साल में)
* 2850 गांव और ढाणियों में ही पहुंच सका पीने का पानी
* 35, 029 गांव और ढाणियों में पीने के पानी की आंशिक व्यवस्था की गई।





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