जोधपुर.
शहर से कुछ दूरी पर बासनी लाछा गांव है। वहां सदियों पहले संपन्न गांव हुआ करता था। आज वहां टीलों में जमींदोज खंभों के समृद्ध अवशेष हैं, जो निरंतर जीर्ण-शीर्ण होते जा रहे हैं। ऐसी ही स्थिति पश्चिमी राजस्थान के कई गांव-नदी के किनारे मिले पुरा-अवशेषों की है। अव्वल तो अधिकांश जगहों पर निकले ऐसे अवशेषों की पुरातत्व विभाग को कोई खबर नहीं है और जहां जानकारी है, वहां जिला प्रशासन ने इन्हें सहेजने का कोई प्रयास नहीं किया है। कुछ स्थल से पुरातत्व विभाग ने मूर्तियां उठाकर म्यूजियम में रखीं।और अपने दायित्व से इतिश्री कर ली। आबू रोड के पास उत्खनन में मिला चंद्रावती नगर दुर्दशा के शिकार का जीता-जागता उदाहरण है।
ऐसा ही कुछ नाडोल में मिली सभ्यता स्थल के साथ हो रहा है। बासनी लाछा, खारीकला और सालोड़ी में मिले प्राचीन सभ्यता स्थलों की ओर तो पुरातत्व विभाग की निगाह ही नहीं गई है। ऐसी स्थिति में राजस्थान जैसे विरासत संपन्न राज्य की धरोहर को संरक्षित करने के लिए किए जाने वाले प्रयासों की पोल सी खुलती महसूस होती है। यदि इन क्षेत्रों को डवलप किया जाए तो खासी विदेशी मुद्रा यहां से भी अर्जित की जा सकती है।
* पुरातत्व धरोहर सर्वेक्षण के तहत जिला प्रशासन के सहयोग से धरोहरों की पहचान का काम चल रहा है। गांव का पटवारी अपने क्षेत्र के अवशेषों की जानकारी देता है। टीम उनका सर्वे करती है। जो दो गांव प्रकाश में आए हैं इनका सर्वे किया जाएगा।
—वीरेंद्र कविया, अधीक्षक, पुरातत्व संग्रहालय विभाग, जोधपुर