इंदौर. दैनिक भास्कर के दफ्तर में शनिवार शाम आक्रोश और दर्द का ज्वालामुखी फूट पड़ा.. शिकायतों का लावा बह गया। शहर में बढ़ते अपराधों, बदमाशों के बुलंद होते हौंसलों और पुलिस की नाकामी के खिलाफ लोग जमकर बरसे। कांफ्रेंस हॉल कभी आरोपों से भट्टी के मानिंद तप जाता तो कभी सुझावों से माहौल लरजता। हर कोई की जबान पर था पुलिस के रुतबे के साथ विश्वास भी खो दिया है। पुलिस को अकर्मण्यता छोड़कर शहर की चिंता करना होगी।
आक्रोशित लोग यह तक बोल पड़े हर महीने एक बदमाश का ‘इनकाउंटर’ करें जनता आपके साथ है लेकिन शहर के विकास के साथ गुंडों की तरक्की न होने दें। शहर में भी यूपी-बिहार जैसे समीकरण बनने लगे हैं। थाने में बदमाशों को वीआईपी ट्रिटमेंट मिल रहा है और पीड़ित यह कहकर दुत्कारे जा रहे हैं कि रिपोर्ट लिखाकर भी क्या कर लोगे।
एक महिला ने पूछा घर में डकैती हुए चार महीने बीत गए बदमाश पकड़े भी गए लेकिन क्या गारंटी है छूटने के बाद बदमाश हम पर हमला नहीं करेंगे। लगातार दो दिन से हो रहे बदमाशों के हमले के कारण घर छोड़ चुके परिजन ने पूछा वापस कैसे लौटें।
घर सूना छोड़कर जाते समय पुलिस को बता तो दें लेकिन सूचना का दुरुपयोग नहीं होने देने की जिम्मेदारी कौन लेगा। सवालों की तेज धार के आगे अफसर अमुमन बचाव की मुद्रा में नजर आए। संसाधनों की कमी और व्यवस्थागत खामियां बताते हुए उन्होंने जनता का सहयोग मांगा। एसपी के प्रतिनिधियों ने उन्हीं की बात ‘बातों से कुछ नहीं होगा’ को खारिज करते हुए कहा इस तरह के टॉक शो होते रहना चाहिए।
संवाद की यह परंपरा बनी रहेगी..
शहर में बढ़ते अपराधों की रोकथाम और पीड़ितों को पुलिस से रूबरू कराने के मकसद से दैनिक भास्कर ने ‘टॉक शो’ आयोजित किया। लोगों और अफसरों के बीच खुलकर संवाद हुआ। शिकायतों के बीच सुझावों का भी आदान-प्रदान हुआ। पीड़ितों ने कहा भास्कर संवाद की इस कड़ी को ऐसे ही बनाए रखे ताकि जो बात किसी से न कह सकें वह यहां उठाई जा सके।
हुयु छे आमरो इंदौर इस्माइल ‘लहरी’.
सुनो..भाई.. संस्कृतिप्रेमी हूं। गांधी हॉल से घुंघरुओं की रुनझुन सुनी तो वेन में बैठकर वन मेले में चला आया। आदिवासी बंधुओं से बड़ा लगाव है मुझे। तुम्हें नाचते देखा तो मन मयूर नाच उठा। कहां..आलीराजपुर से आए हो? अच्छा वन मेले में..बहुत खूब ..हमारा इंदौर तो आपको सिर पर बैठाएगा।
अरे! ..आप कांप रहे हो? इंदौर की ठंड ही ऐसी है कि अच्छे-अच्छे कांपते हैं। मैं देखता हूं..कोई राजनीतिक दल किसी का पुतला-वुतला जला रहा होगा तो उनसे आग्रह कर लेंगे कि यहां जला लो, हमारे आदिवासी मेहमान ताप लेंगे। बहरहाल, इंदौर में आपका स्वागत है।
वह पलटा.. घूरा और बोला..वन मेले में आया हूं, नाच रहा हूं पर सच बोल बता दूं मैं यहां नाचने नहीं आया हूं। नाचने-गाने से इंदौर इकट्ठा हो जाए तो कुछ सवाल पूछना चाहता हूं। उसके इस तेवर से मुझे हलका-हलका पसीना आने लगा था। मैंने स्वेटर उतार दिया और उसे सुनने लगा।
वह बोल रहा था-आप कभी झाबुआ-आलीराजपुर गए हो? नहीं गए होंगे या गए भी होंगे तो डरते-मरते गए होंगे। दिन-दिन में गए होंगे। इंदौर के लोग बहुत संपन्न हैं। सब कुछ मोल ले सकते हैं पर खतरा मोल लेने में डर जाते हैं। झाबुआ-आलीराजपुर की सड़कों पर रात में चलने से कंपकंपी होती थी।
जाने कहां से कोई तीर चला दे! पता नहीं कब-कौन लूट ले। गिनती नहीं आती थी इसलिए हत्याएं गिनते भी नहीं थे। पुलिस तो बस नाम की पुलिस होती थी। उनको वर्दी में भी सर्दी लगती थी इसलिए कानून जलाकर पुलिस थाने में तापती रहती थी। सारे लोग कहते थे आदिवासियों में अशिक्षा और गरीबी के कारण अराजकता पनपती है। इस आरोप से हमें शर्म आई और हम पढ़ने लगे। अब हम लूटपाट नहीं करते।
हम चोरियां करना भूलते जा रहे हैं। हमारे हथियार अब नाचने के काम आने लगे हैं। खून बहाना तो दूर, अब हम पानी तक को रोक रहे हैं और खेती कर रहे हैं। आदमी ही क्या, अब तो हम पेड़ों को भी नहीं काटते। ठंड-वंड से हम नहीं कांपते। तुम अच्छी तरह जानते हो हम क्यों कांप रहे हैं? सुना है अब इस शहर में लूटपाट खूब होने लगी है। रातों में डकैतियों का माहौल बनता है।
गितनी सबको आती है फिर भी मर्डर गिनते नहीं हैं। हमारे भगोरिया में उतनी नहीं भगाई जाती जितनी यहां रोज भगाई जाती हैं। हमारे यहां की पुलिस तो हाप-हुप करती हुई दिखती भी है और यहां तो अखबार में छपता है पुलिस कहां है? हम पूछना चाहते हैं जो बातें हमसे छुड़वाईं, वे सब इस शहर ने क्यों सीख लीं? यहां वन मेले से बड़ा तो वाइन मेला लगा रहता है।
कुल्हाड़ी से भी तीखे उसके सवालों से मुझे लगा मैं उन कटे पेड़ों की तरह गिर जाऊंगा जिनके कटने पर पिछले दिनों हम नाटकीय अंदाज में रोए थे। मैं संभलकर चुप खड़ा रहा। जवाब दे नहीं सकता था सो नहीं दिया पर मन ही मन प्रण किया शहर के जनजातीय स्वरूप पर एक फिल्म बनाई जा सकती है जो अगले साल के फिल्म समारोह में आप सब बिना पास के देख सकेंगे!