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कोटा नहीं आना चाहते डॉक्टर

कोटा. कोटा मेडिकल कॉलेज से हाडोती के लोगों को वह चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिल पा रही, जो मेडिकल कॉलेज के अनुरूप होनी चाहिए। इससे रोगियों को निजी अस्पतालों में उपचार कराना पड़ता है। इसमें मरीजों का समय व पैसा अधिक खर्च होता है। लगभग 15 वर्ष पहले जब कोटा में मेडिकल कॉलेज की स्थापना हुई तो स्थानीय लोगों को लगा कि अब क्षेत्र को सरकारी स्तर पर बेहतर चिकित्सा सेवाएं मिलेंगी।

समय गुजरता रहा लेकिन, सेवाओं में विस्तार की जगह विशिष्ट सेवाओं के डाक्टर यहां से छोड़कर अन्यत्र जाते रहे। कोटा मेडिकल कॉलेज से सम्बद्ध एमबीएस अस्पताल व जे.के.लोन मातृ एवं शिशु चिकित्सालय के सभी विभागों में परम विशेषज्ञों के पद स्वीकृत हैं। इन पदों को तदर्थ से भरने के लिए भी चिकित्सा शिक्षा सचिव ने स्वीकृति दे रखी है।

लेकिन, परम विशेषज्ञों ने यहां आने में कोई रूचि नहीं दिखाई है। जे.के.लोन मातृ एवं शिशु चिकित्सालय के शिशु शल्य चिकित्सक का पद लगभग डेढ़ वर्ष से रिक्त पड़ा है। एमबीएस से हृदय रोग विशेषज्ञ व गेस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट की सेवाएं विशेषज्ञों के यहां से जाने के कारण बंद हो गई है। इसके कारण रोगियों को निजी अस्पतालों में उपचार कराना पड़ता है।

निजी चिकित्सालयों में बेहतर पैकेज

परम विशेषज्ञ बनने के बाद चिकित्सकों का झुकाव निजी चिकित्सालयों में सेवा देने की ओर ज्यादा रहता है। वह सरकारी अस्पतालों में सेवाएं देने से कतराता है। इसका मुख्य कारण निजी अस्पताल में सरकारी अस्पतालों की तुलना में वेतनमान व सुविधा अधिक मिलती है। इसके अलावा उसे तबादले का भय भी नहीं रहता।

यह सही है कि मेडिकल कॉलेज में परमविशेषज्ञ सेवाएं नहीं है। इसके लिए प्रयास जारी है। राज्य सरकार ने अनुबंध पर रखने के आदेश दिए हैं लेकिन, विशेषज्ञ इसके प्रति रुचि नहीं दिखा रहे।
—डॉ. जी.एल.वर्मा, प्राचार्य मेडिकल कॉलेज

सीटें कम होती है। पढाई का लंबा सफर तय करना पड़ता है। निजी अस्पतालों में सरकारी की तुलना में पैसा व सुविधा अच्छी मिलती है।
—डा. समीर मेहता, शिशु शल्य चिकित्सक

सरकारी अस्पतालों में पद भरने के बाद बेसिक सुविधा नहीं मिल पाती। इस कारण कई परम विशेषज्ञ काम छोड़ जाते हैं।
—डा. कृष्ण हरि शर्मा, न्यूरोसर्जन





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