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Chhattisgarh
Raipur Raipur केशकाल. कांग्रेस और भाजपा की चुनावी शोर के बीच मतदाताओं की खामोशी बरकरार है। महज कुछ महीनों के लिए केशकाल का नया विधायक चुना जाना है, इस कारण भी लोगों में बहुत अधिक उत्साह नजर नहीं आ रहा है। कांग्रेस चुनाव जीतकर रमन सरकार को हाशिए पर डालने की कोशिश में है, और रमन सरकार चुनाव जीतकर प्रदेश में अपना प्रभुत्व बताने के प्रयास में लगी है।
चुना गया विधायक निश्चित रूप से कुछ समय के लिए होगा लेकिन इन चुनावों से राजनीतिक संदेश देने की जुगत में दोनों ही दल भिड़े हैं। रमन सरकार के करीब 10 मंत्रियों की मौजूदगी से साफ-साफ समझा जा सकता है कि भाजपा इस चुनाव को कितनी गंभीरता से ले रही है। वह चुनाव जीतकर यह साबित करना चाहती है कि प्रदेश में उसकी पकड़ किसी भी मायने में कम नहीं है।
दूसरी ओर कांग्रेस इस चुनाव में भाजपा को पटखनी देकर यह संदेश देना चाहती है कि उसके लिए अब राज्य में सरकार बनाने का अवसर है। मतदाता रमन सरकार से नाराज है और वह परिवर्तन चाहती है। लिहाजा दोनों दलों की तैयारियों में महारथियों के अपने-अपने दांव हैं।
अभनपुर के पास सड़क हादसे में विधायक महेश बघेल की मौत के बाद खाली हुई सीट पर सत्ताधारी भाजपा प्रत्याशी सेवकराम नेताम का मुकाबला कांग्रेस के बुधसन मरकाम से है। उपचुनाव में कोई ऐसा बड़ा मुद्दा नहीं है, जिसके भरोसे लहर चलने जैसी बात हो।
रमन सरकार के पांचवें उपचुनाव में भाजपा किसी तरह का जोखिम उठाने के मूड में कतई नहीं है। पार्टी के लिए तुरुप का पत्ता तो उसका प्रत्याशी सेवकराम नेताम हैं, जिसके सहारे एक तीर से पार्टी ने कई निशाने लगाए हैं।
संगठन ने दबाव बनाकर राजस्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को भी चुनाव प्रचार से जोड़ लिया। भाजपा को सत्ता में रहने का फायदा है तो नुकसान भी। सरकार ने विकास के साथ साथ तीन रुपए किलो में गरीबों को चावल का दांव चला है।
इसके अलावा भाजपा लो प्रोफाइल में चुनाव लड़ रही है। यही वजह है कि ज्यादातर मोर्चे पर स्थानीय नेताओं को सामने किया गया है। रणनीति के तहत बाहर से आए मंत्री और नेता समन्वय का काम कर रहे हैं।
दूसरी तरफ गुटों में बंटी कांग्रेस भी पूरी ताकत लगाने का दावा कर रही है। भाजपा शासनकाल में हुए भ्रष्टाचार, अब तक अधूरे चुनावी घोषणा पत्र के वादों, गाय-बैल बांटने की योजना के अलावा शिक्षाकर्मी भर्ती आवेदन के लिए चार सौ रुपए लेने के फैसले को लेकर कांग्रेस मतदाताओं के दरवाजे पहुंची है। ऐसे मामले लोगों को अपील भी कर रहे हैं। खुद भाजपाई यह मान रहे हैं कि शिक्षाकर्मी भर्ती फार्म को बेचने का मामला मुश्किल पैदा कर रहा है।
गांवों में बेरोजगारी का मुद्दा कायम है। गुटबाजी से यदि कांग्रेस उबर गई और मतदाताओं की नाराजगी को उसने वोटों में बदल लिया तो भाजपा के लिए मुश्किल हो सकती है। कांग्रेस को चुनावी समर में दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ रही है। भाजपा के अलावा पार्टी के ही कुछ नेताओं की निष्क्रियता और भितरघात की आशंका से पार्टी नेताओं की चिंता बढ़ गई है।
वैसे चुनाव प्रचार के दौरान प्रत्याशी चयन विवाद हावी हो गया है। भाजपा में महेश बघेल की दोनों पत्नियों को टिकट नहीं देने का मुद्दा हावी हो गया तो कांग्रेस में फूलोदेवी नेताम को टिकट नहीं देना चुनावी मोर्चे पर असर दिखला रहा है। केशकाल से फूलोदेवी नेताम पहले भी विधायक चुनी गई हैं और प्रत्याशी चयन के दौरान उनका नाम सबसे ऊपर था।
कहा जा रहा है कि उनको टिकट नहीं देने जोगी खेमे के लोगों का अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पा रहा है। स्वयं फूलो देवी अपने ससुर के देहांत के कारण चुनाव प्रचार में नहीं निकल पाईं। अजीत जोगी के कुछ कट्टर समर्थक, जिनका इलाके में अच्छा असर है, सक्रिय नहीं हैं। खुद अजीत जोगी प्रचार खत्म होने के एक दिन पहले केशकाल में पहुंचे और फूलोदेवी का टिकट काटे जाने से नाराजगी का जिक्र करने से नहीं चूके।
कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी नारायण सामी ने पूरे केशकाल क्षेत्र को सेक्टरों में बांटकर कांग्रेस विधायकों और सांसदों को प्रभारी बनाया है। पर इसका असर कितना होगा, आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।
कोया भूमकाल के वोट बैंक में सेंधमारी : सेवकराम को टिकट देने का एक कारण केशकाल विधानसभा सीट में बेहद प्रभावी कोया भूमकाल संगठन के मत हैं। बुधसन मरकाम इसी संगठन के मुखिया हैं। संगठन से जुड़े मतदाताओं की संख्या करीब 12 से 15 हजार के बीच है और ये मत एकतरफा गिरते हैं। कांग्रेसने टिकट वितरण शुरू होने के पहले ही तय किया था कि 71 साल के बुधसन को टिकट नहीं मिली तो उन्हें निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में खड़ा किया जाएगा।
मजे की बात यह है कि खुद भाजपा प्रत्याशी सेवकराम इसी संगठन के ब्लाक सचिव हैं। इन मतों को झोंकने के लिए कांग्रेस ने अपना आंचल फैला लिया था, लेकिन ऐन समय पर उनकी योजना लीक हो गई और भाजपा ने सेवकराम को मैदान में उतार दिया। केशकाल विधानसभा क्षेत्र के जातिगत समीकरण को देखें तो यहां आदिवासी मतदाताओं की संख्या करीब 60 फीसदी है, जिसमें से ज्यादातर 60 हजार गोंड और 10 हजार हल्बा हैं। बाकी मतदाता गैरआदिवासी हैं।
नक्सलियों का असर : केशकाल विधानसभा में कुल 150 मतदान केंद्र हैं। इनमें से 100 नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हैं। इसके अलावा राजनीतिक दृष्टि से 23 मतदान केंद्र संवेदनशील हैं। वहां केवल 27 मतदान केंद्र सामान्य हैं। करीब 25 मतदान केंद्र ऐसे हैं, यहां नक्सलियों की जबर्दस्त पकड़ है।
धनोरा, बड़े डोंगर, अरंडी जैसे इलाकों में ज्यादातर मतदान केंद्र नक्सली दबदबे वाले हैं। नक्सलियों की वजह से कुछ गांवों में छिटपुट पोस्टर ही लगे हैं। कुछ महीनों पहले विश्रामपुरी थाने पर हमला कर उसे ध्वस्त करने वाले नक्सलियों ने अपने मंसूबे जाहिर कर दिए।
निर्दलियों की भूमिका : उप चुनावों में निर्दलियों की भूमिका अहम रहेगी। संयुक्त मोर्चा के बैनर तले चुनाव में खड़े हल्बा समाज के सोनूराम नाइक सबसे मजबूत हैं। वे हल्बा समाज के अकेले प्रत्याशी हैं, जिसके मतदाताओं की संख्या केशकाल में करीब 10 हजार है। गोंड समाज के वोटों में जमकर विभाजन हुआ है। कांग्रेस, भाजपा समेत एक और निर्दलीय नोहरूराम सोरी, शिवसेना के महेश ठाकुर भी गोंड हैं।
>> बुधसन की समाज में अच्छी प्रतिष्ठा है। पूरा माहौल भाजपा के खिलाफ है।
चरणदास महंत, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष
>> भाजपा की सत्ता की ताकत का मुकाबला कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं की ईमानदार मेहनत से कर रही है। सरकार की चार साल की नाकामी को तीन रुपए का चावल ढंक नहीं पा रहा।
महेंद्र कर्मा, नेता प्रतिपक्ष
>> मतदाताओं में राज्य शासन के खिलाफ कोई नाराजगी नहीं। तीन रुपए किलो चावल की योजना और विकास से लोग संतुष्ट।
रामविचार नेताम, गृहमंत्री
>> भाजपा की उपचुनाव में जीत तय है। मतदाता पार्टी के साथ हैं।
बृजमोहन अग्रवाल, राजस्व मंत्री
भारी फोर्स तैनात
नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण चुनाव आयोग ने वहां सुरक्षा के ठोस इंतजाम किए हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी डा. आलोक शुक्ला ने बताया कि सीआरपीएफ की 26 कंपनियां चुनाव कार्य में लगाई गई हैं।
इसके अलावा राज्य पुलिस के 1500 जवानों को तैनात किया गया है। इनके अलावा 150 केंद्रों के लिए 22 जोनल अधिकारी, पांच सेक्टर प्रभारी, 22 डाक्टर, 165 पीठासीन अधिकारी, 165 पोलिंग अफसर-1, 165 पोलिंग अफसर-2 और 165 पोलिंग अफसर-3 तैनात किए जाएंगे। मतगणना के लिए 400 कर्मचारी तैनात किए गए।
डेढ़ लाख मतदाता
केशकाल उपचुनाव में एक लाख 52 हजार 403 मतदाता हैं। प्रति मतदान केंद्र में 1016 मतदाता हैं।
भाजपा के पक्ष में क्या
सत्ता में होने का लाभ
बेहतर चुनाव प्रबंधन, संसाधनों की कमी नहीं
कार्यकर्ताओं की फौज, आरएसएस से जुड़े कई संगठनों की इलाके में सक्रियता
तीन रुपए किलो में गरीबों को 35 किलो चावल देने की योजना।
क्या मुद्दे कर सकते हैं नुकसान
इंटी इंकम्बेंसी फैक्टर
नक्सली इलाकों में होने वाला मतदान
गायत्री परिवार के महाप्राण को टिकट नहीं देने का फैसला
पिछले चुनावी वादे अधूरे रहना। विकास की धीमी गति
गाय बैल बांटने में गड़बड़ी
शिक्षाकर्मी भर्ती फार्म 400 रुपए का।
कांग्रेस की परेशानी
गुटबाजी, असरदार नेताओं का घर बैठ जाना ठ्ठ जिम्मा संभालने वाले कुछ मुट्ठी भर लोग
संसाधनों की कमी।
कांग्रेस के फायदे
भाजपा सरकार के खिलाफ नाराजगी का लाभ
बघेल की पत्नियों में से किसी को भी टिकट नहीं देने से समर्थकों में नाराजगी।