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संभलकर,ये है डीजी मैराथन

जयपुर. officer वर्तमान डीजीपी अमरजोतसिंह गिल का पद स्थापन केंद्रीय मानवाधिकार आयोग में महानिदेशक के रूप में हो चुका है। वे जल्द ही अपने मौजूदा पद से विदाई ले लेंगे। वे फिलहाल छुट्टी पर हैं और 5 फरवरी को लौटने के बाद रिलीव होने के बारे में अधिकारियों से बातचीत कर फैसला करेंगे। उनके रिलीव न होने के बावजूद नए डीजीपी की तलाश की कवायद शुरू हो गई है।

राज्य के आला पुलिस अफसरों में डीजीपी पद के कई दावेदार हैं, जिन्हें परखा जा रहा है। खास बात यह है कि डीजीपी पद के पांच प्रमुख दावेदारों में तीन ब्राrाण, एक जटसिख और एक मीणा हैं। इनमें चार राजस्थान और एक पंजाब के हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या पंजाब इस प्रतिद्वंद्विता में राजस्थान को पछाड़ देगा? हमने कुछ दावेदारों के सीवी के आधार पर आकलन करने की कोशिश की है।

ये हैं दावेदार

पीके तिवाड़ी

डीजी जेल पीके तिवाड़ी 1972 बैच के आईपीएस हैं। गिल 72 बैच के थे। जब उन्हें डीजीपी बनाया जा रहा था तब तिवाड़ी भी दावेदार थे। अब वरिष्ठता आधार बनती है तो सबसे मजबूत दावेदारी तिवाड़ी की ही है। 5 जून 1949 को जन्मे तिवाड़ी फोर्स के सीधे संपर्क में हैं और लंबे समय से प्रदेश में हैं। वे उदयपुर और बीकानेर रेंज में रह चुके हैं। वे मूलत: आबू रोड के हैं। डीजी एसीबी रहते 50 करोड़ का एडीएम पकड़ना उनकी चर्चित कामयाबी ही है।

एचसी मीणा

होमगार्ड के डीजी एचसी मीणा 1976 बैच के आईपीएस हैं। सवाई माधोपुर के रहने वाले मीणा केंद्रीय मंत्री नमोनारायण मीणा के छोटे भाई हैं। 5 सितंबर 1954 को जन्मे मीणा शुरू से ही लो-प्रोफाइल रहे हैं। मीणा झालावाड़, जालौर, बाड़मेर, टोंक, नागौर, बांसवाड़ा और पाली जिलों में एसपी के रूप में काम कर चुके हैं। बीए ऑनर्स शिक्षित मीणा दिसंबर 04 से नवंबर 07 तक सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स में आईजी रहे हैं। मीणा नवंबर में प्रदेश वापस लौट आए। वे क्राइम रिकार्ड ब्यूरो और पुलिस महानिरीक्षक मानवाधिकार के रूप में भी काम कर चुके हैं।

केएस बैंस

एंटीकरप्शन ब्यूरो के डीजी केएस बैंस 1976 बैच के आईपीएस हैं। 10 मार्च 1951 को पंजाब के होशियारपुर में जन्मे बैंस सिरोही, सवाई माधोपुर और अजमेर में एसपी रह चुके हैं। सोशल साइकोलॉजी और एब्नॉर्मल साइकोलॉजी में एमए बैंस फरवरी 1986 से अप्रैल 07 तक प्रदेश से बाहर रहे हैं।

बैंस दिल्ली, शिमला, अमृतसर, चंडीगढ़ आदि जगहों पर डिप्टी डायरेक्टर और ज्वाइंट डायरेक्टर के स्तर पर काम कर चुके हैं। आईबी में रहते भी उन्होंने राज्य के सीमावर्ती जिले श्रीगंगानगर में तीन साल तक डिप्टी डायरेक्टर के रूप में काम किया था। राजस्थान लौटने के बाद वे डीजी जेल भी रहे। इंटेलीजेंस के लिहाज से अच्छे टीम लीडर साबित हो सकते हैं।

एमएल शर्मा

तिवाड़ी के अलावा 1972 बैच के एक अन्य आईपीएस एमएल शर्मा हैं, जो फिलहाल केंद्र में सीबीआई के विशेष निदेशक हैं। 11 अप्रैल 1949 को जन्मे शर्मा दिसंबर 2003 से प्रदेश से बाहर हैं। दिल्ली जाने से पहले वे एडीजी सतर्कता थे। वरिष्ठता के आधार पर शर्मा की दावेदारी मजबूत है, लेकिन वे राजस्थान आने के कम इच्छुक बताए जाते हैं। मूलत: अलवर के निवासी हैं।

वे डूंगरपुर, बांसवाड़ा, झुंझुनूं, भीलवाड़ा, उदयपुर और अजमेर में एसपी रह चुके हैं। वे जेडीए में डायरेक्टर विजिलेंस के अलावा सीबीआई में डीआईजी और एडीजी भी रह चुके हैं। शर्मा ने कुछ समय सीमा सुरक्षा बल में भी काम किया है। पुलिस अनुसंधान में उन्हें महारत है।

ओमेंद्र भारद्वाज

फिलहाल एडीजी हैडक्वार्टर ओमेंद्र भारद्वाज 1977 बैच के आईपीएस हैं। बीएससी-एलएलबी शिक्षित भारद्वाज का जन्म 27 फरवरी 1955 को हुआ था। वे डीजी पद के अन्य दावेदारों की तुलना में काफी युवा हैं। काबिल अफसरों में भारद्वाज का एक मजबूत पक्ष यह भी है कि उनका परिवार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ा रहा है।

उनके पिता जयपुर के उप महापौर रह चुके हैं। आम तौर पर विवादों से दूर रहे भारद्वाज टोंक, चित्तौड़गढ़, झुंझुनूं और भरतपुर में एसपी के रूप में काम कर चुके हैं। वे आईजी एंटीकरप्शन, आईजी क्राइम ब्रांच, आईजी प्लानिंग एंड वेल्फेयर के अलावा एडीजी इंटेलीजेंस के रूप में भी अपनी काबिलियत साबित कर चुके हैं।

पिछली बार क्या हुआ था

अब तक प्रदेश में 25 डीजीपी बन चुके हैं। पहले पुलिस प्रमुख आर. बैनर्जी थे, लेकिन सबसे चर्चित पुलिस प्रमुख सुलतानसिंह को माना जाता है। सुलतानसिंह 1968 से 1974 के दौरान पुलिस प्रमुख रहे थे। अब डीजीपी चयन प्रक्रिया में सवाल उठ रहा है कि क्या इस बार भी वरिष्ठता की वर्जना टूटेगी?

पुलिस विभाग के अफसरों का कहना है कि सितंबर 2000 में जब अमिताभ गुप्ता रिटायर हुए तो अशोक भंडारी की वरिष्ठता को लांघकर शांतनु कुमार को डीजीपी बनाया गया था। भंडारी बाद में केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर चले गए थे। शांतनुकुमार के बाद वीके हांसुका डेढ़ साल पुलिस के मुखिया रहे। उनके बाद एक माह के लिए एसएन जैरथ को डीजीपी बनाया गया।

हांसुका के बाद 69 बैच के अरुण दुग्गड़ को कमान दी जानी चाहिए थी, लेकिन उन्हें नहीं मिली। 70 बैच के एके सिंह और 71 बैच के राजगोपाल भी यह पद नहीं पा सके। इस तरह 72 बैच के तीन अफसरों में से एक एएस गिल पुलिस मुखिया बन गए।

इस बार 72 बैच के तिवाड़ी और शर्मा डीजीपी नहीं बने तो फिर यह मामला 76 और 77 बैच पर जा सकता है, क्योंकि 73 बैच के आरएस चौहान और 74 बैच के रामजीवन मीणा रिटायर हो गए हैं। 75 बैच के नवीन शर्मा की कई साल पहले मृत्यु हो गई थी। इस तरह अब 76 बैच के केएस बैंस और एचसी मीणा और 77 बैच के ओमेंद्र लाइन में हैं।





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