दृष्टिकोण. पाकिस्तान बदल रहा है। पश्चिमी देशों के लिए पाकिस्तानी राजनीति की जमीनी हकीकतों को समझ पाना वाकई मुश्किल काम है। अफगानिस्तान सीमा से लगे उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत में आतंकवाद में बढ़ोतरी हुई है मगर इसी प्रांत में धार्मिक राजनीति ढलान पर है। यदि 18 फरवरी को होने वाले आम चुनाव स्वतंत्र और स्वच्छ हुए तो इन से देश में चुनावी राजनीति का पूरा परिदृश्य बदल सकता है।
अक्टूबर 2002 में हुए पिछले चुनावों में धार्मिक पार्टियों और उनके सहयोगियों का दबदबा बढ़ा था और उन्होंने उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत के साथ ही बलूचिस्तान में भी सत्ता हथिया ली थी मगर इस बार ऐसा होने के आसार नहीं हैं। 18 फरवरी को होने वाले चुनाव यह साबित कर सकते हैं कि आतंकवाद में बढ़ोतरी की वजह धर्म के आधार पर होने वाली राजनीति नहीं बल्कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध की खराब रणनीति रही है।
2002 और 2008 में भारी अंतर है। 2002 में परवेज मुशर्रफ सेना की वर्दी में थे। 2008 में वे वर्दी उतार चुके हैं। 2002 में दो पूर्व प्रधानमंत्री निर्वासन में जीवन बिता रहे थे। उनकी गैर मौजूदगी में धार्मिक पार्टियों को अपना असर बढ़ाने में मदद मिली। 2007 में दोनों स्वदेश लौट आए। हालांकि वे अभी भी चुनावी राजनीति में नहीं हैं लेकिन उनकी पार्टियां किसी अन्य को, खासकर धार्मिक पार्टियों को सत्ता प्रतिष्ठान विरोधी वोटों में सेंध नहीं लगाने देंगी।
कम से कम तीन प्रांतों में पीपीपी और पीएमएल-एन उदारवादी और अर्ध-आधुनिक राजनीतिक ताकतों की प्रतिनिधि बनकर उभरेंगी। सेकूलर और राष्ट्रवादी पार्टियों द्वारा चुनावों का बहिष्कार करने के कारण केवल बलूचिस्तान में धार्मिक पार्टियों का गठबंधन फिर से सत्ता में आ सकता है। दरअसल, गत 27 दिसंबर के बाद से पाकिस्तान की राजनीति में कुछ नई वास्तविकताएं उभरकर सामने आई हैं।
बेनजीर भुट्टो 18 अक्टूबर 2007 को पाकिस्तान लौटी थीं। वे अपने गृह प्रांत सिंध की सीट नंबर 207 से राष्ट्रीय असेंबली का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही थीं। 27 दिसंबर को उनकी हत्या हो जाने के बाद इस सीट का चुनाव रद्द कर दिया गया है। नवाज शरीफ ने लाहौर से अपना पर्चा दाखिल किया था मगर पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने उनका पर्चा रद्द कर दिया।
बेनजीर अपनी मौत के बाद अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के लिए उससे बड़ा खतरा बन गई हैं जितना कि जीवित रहते हुए थीं। 27 दिसंबर एक तरह से भुट्टो विरोधी ताकतों के लिए 9/11 साबित हो रहा है। उस दिन बेनजीर महान हस्ती बन गईं। रावलपिंडी के मूरी रोड के हरेक चौराहे पर 20-20 रुपए में उनके पोस्टर बिकते हुए नजर आते हैं मगर उनकी पार्टी इस स्थिति में नहीं है कि वह हरेक चुनाव क्षेत्र में अपनी मरहूम नेता की लोकप्रियता को भुना सके। 342 सदस्यों वाली राष्ट्रीय असेंबली में स्पष्ट बहुमत हासिल कर पाना पीपीपी के लिए अभी भी बहुत मुश्किल है।
मतदान का प्रतिशत अच्छा रहने की स्थिति में उसे सहानुभूति का लाभ मिल सकता है। यदि मतदान का प्रतिशत ऊंचा रहा तो अपने ही गढ़ पंजाब में पीएमएल-क्यू की हालत पतली हो सकती है। 27 दिसंबर के पहले मुशर्रफ समर्थक यह पार्टी न केवल पंजाब में चुनावी जीत हासिल करने के लिए आश्वस्त थी बल्कि उसके नेता चौधरी परवेज इलाही प्रधानमंत्री पद के गंभीर दावेदारों में भी शुमार किए जा रहे थे।
अब उसे पंजाब में पीपीपी से कड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है। इस बार पंजाब में किसी भी पार्टी के लिए बहुमत हासिल करने की संभावना बहुत कम है। राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन है कि नई राष्ट्रीय असेंबली तथा पंजाब व सीमा प्रांत की नई विधानसभाएं त्रिशंकु हो सकती हैं।
2008 के चुनावों में कुछ ही दिन बाकी रह गए हैं मगर प्रमुख दलों ने अभी तक प्रधानमंत्री पद के लिए अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित नहीं किए हैं। पिछले साल इमरजेंसी की घोषणा के पहले पीएमएल-क्यू ने मौलाना फजल-उर-रहमान के साथ गुपचुप समझौता किया था कि राष्ट्रपति चुनाव में मुशर्रफ को समर्थन देने के एवज में मौलाना को प्रधानमंत्री बनाया जाएगा।
मौलाना ने अपना वादा पूरी भी किया मगर अब मौलाना की पार्टी जेयूआई टूट चुकी है और 60-70 से ज्यादा सीटें जीत पाने की स्थिति में नहीं है। उधर, पीएमएल-क्यू ने परवेज इलाही को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करने का ऐलान किया है। उसे अभी भी 100 सीटें जीतने की उम्मीद है पर यह तभी संभव होगा जबकि चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली हो।
चुनाव के बाद पीएमएल-क्यू और पीपीपी की साझा सरकार बनने की अटकलें अभी से लगाई जा रही हैं मगर पीपीपी के लिए पीएमएल-क्यू पर भरोसा करना आसान नहीं होगा। वह पहले अन्य दलों के साथ गठबंधन की कोशिश कर सकती है जिनमें पीएमएल-एल, एएनपी और मुशर्रफ समर्थक एमक्यूएम प्रमुख हैं। वह संसदीय प्रणाली में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के अधिकारों के बारे में भी स्थिति स्पष्ट करना चाहेगी। यदि यह मामला नहीं सुलझा तो देश में राजनीतिक स्थिरता कायम होने में दिक्कतें आना लाजिमी है।
बहरहाल, त्रिशंकु राष्ट्रीय असेंबली चुने जाने से पाकिस्तान में ज्यादा सार्थक बदलाव नहीं आ पाएगा। ऐसा बदलाव किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने की स्थिति में ही आ सकता है। मजबूत राष्ट्रीय असेंबली ही स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस को बढ़ावा दे सकते हैं। स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस के बगैर वास्तविक लोकतंत्र कायम ही नहीं हो सकता। पाकिस्तान के बेहतर भविष्य के लिए वास्तविक लोकतंत्र ही एकमात्र रास्ता है। मतदाता बड़ी संख्या में वोट दे कर ऐसा कर सकते हैं।
2002 के चुनाव में केवल 41 फीसदी वोट पड़े थे। इस बार यह प्रतिशत 60 तक भी पहुंचा तो पाकिस्तान सार्थक बदलाव की दिशा में कुछ आगे बढ़ेगा। बदलाव विरोधी कुछ ताकतें मतदाताओं को वोट देने के लिए निकलने के लिए रोकने की कोशिशें कर सकती हैं। वे कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा करने की कोशिश भी कर सकती हैं।
बदलाव समर्थक ताकतों को उनके द्वारा दहशत का माहौल बनाए जाने का विरोध करना होगा और मतदाताओं को बड़ी संख्या में वोट डालने के लिए प्रेरित करना होगा। पाकिस्तान के लिए वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना का यह आखिरी मौका भी हो सकता है।