संपादकीय. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता और शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने मुंबई में उत्तर भारतीयों के खिलाफ मोर्चा खोलकर और क्षेत्रीय संकीर्णता के जिन्न को बोतल से बाहर निकाल कर एक ऐसे विवाद को जन्म दिया है जो हमारे देश के संघीय ढांचे पर कुठाराघात करता है।
बिहारियों द्वारा छठ पर्व मनाए जाने को नाटक करार देने और बिग बी अमिताभ बच्चन के उत्तरप्रदेश प्रेम पर ताने कसने के राज के कृत्य की जितनी भी निंदा की जाए कम है। क्षेत्रीय संकीर्णता के इस विषधर को समय रहते कुचल डालने में ही देश का भला है अन्यथा इसका जहर फैलने में ज्यादा देर नहीं लगेगी।
जाहिर है कि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख के ऐसा करने का मकसद मराठी भाषी वोट बैंक को अपनी पार्टी के साथ जोड़ना रहा होगा पर परंपरा से उदात्त मराठी समाज उनके इस संकीर्ण नजरिये के समर्थन में उठ खड़ा हो इसकी संभावना न के बराबर है। राज के चाचा बालासाहेब दशकों से संकीर्ण महाराष्ट्रवाद की राजनीति करते रहे हैं लेकिन महाराष्ट्र की सत्ता में उनकी पार्टी तभी भागीदार बन पाई जब उसने भाजपा सरीखी राष्ट्रीय पार्टी से हाथ मिलाया।
बालासाहेब की शिवसेना से अलग होकर राज ने अपनी जो नई राजनीतिक दुकान खोली है वह तमाम जतन करके भी न तो कोई साख बना पाई है और न जनाधार ही। शायद इसी से हताश हो कर राज ने उत्तर भारतीयों पर हमला बोला है जो भोथरा होने के साथ ही समाज को बांटने वाला भी है।
सुरक्षा संबंधी कारणों को छोड़ दें तो देश के नागरिक देश के किसी भी हिस्से में आने-जाने, रोजी-रोटी कमाने और अपनी रीतियों-परंपराओं का पालन करने के लिए स्वतंत्र हैं। यह उनके संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों का हिस्सा है। मुंबई में बिहारियों द्वारा छठ पूजा करने को नाटक बताकर राज ने वहां रहने वाले बिहारियों के मूल अधिकारों को चुनौती दी है।
अमिताभ बच्चन के उत्तरप्रदेश प्रेम पर उनकी तानाकशी भी इसी दायरे में आती है। बिहारियों को मुंबई में छठ पूजा करने का उतना ही हक है जितना कि महाराष्ट्रियनों को देशभर में गणोशोत्सव मनाने का। असल में छठ पूजा, गणोशोत्सव, दुर्गा पूजा, होली, दिवाली, दशहरा, ईद, पोंगल, लोहड़ी, क्रिसमस और दूसरे तमाम त्योहार किसी क्षेत्र विशेष के नहीं बल्कि पूरे देश के हैं।
यह अलग बात है कि अलग-अलग स्थानों में इन त्योहारों को मनाने का पैमाना अलग-अलग है पर देश को जोड़ने में इन सभी की महत्वपूर्ण भूमिका है। नवनिर्माण के नाम पर विध्वंस की राजनीति का रास्ता अपना कर राज ऐसी अंधी गली की ओर बढ़ रहे हैं जहां से कोई मंजिल नहीं मिलती।