डॉक्टरी पेशे पर लगातार गंभीर आरोप लगते रहे हैं। नवीनतम गुर्दा कांड ने उनकी दरिंदगी को पूरी तरह उजागर कर दिया है। इस कांड ने अंग प्रत्यारोपण में हो रहे गरीबों के शोषण में पश्चिमी देशों की साजिश को भी बेनकाब किया है। इसने भारत के मेडिकल पर्यटन के लिए एक महत्वपूर्ण देश के रूप में उभरने पर भी सवालिया निशान खड़ा किया है कि क्या पश्चिमी देशों के मरीज यहां इसलिए आ रहे हैं क्योंकि गरीब लोगों के गुर्दे, लीवर आदि उन्हें सस्ती कीमतों में मिल जाते हैं।
अब शर्मसार डॉक्टर समुदाय अपनी झेंप ढकने के लिए कह रहा है कि इस कांड का सरगना डॉ. अमित एमबीबीएस डॉक्टर नहीं है। भला यह तर्क किसके गले उतरेगा कि डॉक्टर इस कारण निर्दोष हैं और कोई माहिर सर्जन ही मानव अंग को सफलतापूर्वक निकाल सकता है। मानव अंगों को दान देने का पूरा मुद्दा तबसे विवादास्पद हो गया जब इन्हें खरीदने की अवधारणा प्रचलित हो गई।
भारत में मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 एवं अन्य देशों में बने ऐसे कानून अंगदाताओं को धन या कोई अन्य कीमती वस्तु देने की इजाजत नहीं देता है। पश्चिमी राष्ट्रों ने प्रारंभ में इसका उच्च नैतिक पक्ष लेते हुए दाताओं को भुगतान करने तथा तीसरी दुनिया के गरीबों के शोषण का विरोध किया। कमिटी ऑफ एथिक्स एंड मोरल ट्रांसप्लांटेशन सोसायटी ने 1971 में घोषणा की कि अंगों की खरीद-बिक्री पूरी तरह अस्वीकार्य है।
फिर 1980 मे वर्ल्ड ट्रांसप्लांटेशन सोसायटी ने स्पष्ट कहा कि गैर-रिश्तेदारों के बीच गुर्दा दान किसी भी हालत में नहीं किया जाना चाहिए। परंतु इन सभी घोषणाओं को अजीबोगरीब ढंग से पलटते हुए सोसायटी ने 1990 के अपने म्यूनिख सम्मेलन में आचार संहिता को बदल दिया। ‘हम दृढ़ता से मानते हैं कि गैर-रिश्तेदार किंतु भावनात्मक रूप से संबंधित व्यक्तियों के बीच अंग दान संभव है।’
यहां यह समझना कठिन है कि गैर रिश्तेदार व्यक्तियों को दाता की परिधि में लाने के लिए भावनात्मक संबंध की बात कही गई है। इसके बाद फरवरी 2003 में सोसायटी ने गुर्दा प्रत्यारोपण के लिए दिशा-निर्देश जारी किए। ‘जिंदा दाता की बढ़ती हुई सफलता तथा मृत व्यक्तियों के अंगों की कमी को देखते हुए जिंदा दाता प्रत्यारोपण लिविंग डोनर ट्रासप्लांटेशन एक खेदजनक आवश्यकता के रूप में देखी गई है।’
इस प्रकार पश्चिम प्रत्यारोपण से संबंधित आचार संहिता अपनी सुविधानुसार लगातार बदलता रहा है क्योंकि उसके यहां मांग के लिए गैर-रिश्तेदार प्रत्यारोपण का औचित्य प्रमाणित करती है। मशहूर पत्रिका इकोनॉमिस्ट ने तो यहां तक लिख दिया कि यदि कानून जीवन बचाने के लिए आपको किसी अंग को खरीदने की इजाजत नहीं देता है तो आपका जीवन का अधिकार बेमानी हो जाता है।
यह तर्क सही नहीं है क्योंकि इसे वैध बना देने से गरीबों का शोषण और बढ़ेगा। यह भी तर्क दिया जाता है कि कानूनी प्रतिबंध से कोई चीज समाप्त नहीं होती, जैसे वेश्यावृत्ति। यह भी सही है कि अभी मानव अंगों की कालाबाजारी हो रही है। अभी अमेरिका में यह व्यापार 800 अरब डॉलर एवं भारत में 250 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष का है। परंतु यदि इस व्यापार को वैध कर दिया जाए तो शोषण और भी बढ़ेगा।
इसे वैध करने के प्रबल विरोधी सेपर ह्यूज का कहना है कि सामान्य तौर पर अंगों का दान, विशेषकर गुर्दे का, दक्षिण से उत्तर, गरीब से अमीर, काले से गोरे और स्त्री से पुरुष की दिशा में होता है। जीवित एवं मृत दाताओं की संख्या के मुकाबले अंगों की मांग करीब 5 गुना तेज बढ़ी है। 1990 से 2000 के बीच प्रतीक्षा सूची में 14 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है, जबकि दाताओं में 3 प्रतिशत।
ईरान में अंग व्यापार को कानूनी अनुमति मिल गई है परंतु यह किसी विदेशी को नहीं बेचा जा सकता है। यह एक आदर्श कानून माना जाता है, परंतु वहां के सर्वेक्षण भी चौंकाने वाले हैं। वहां के कर्मनशाह विश्वविद्यालय के यूरोलॉजी विभाग के जावाद जरगूशी ने इस पर अध्ययन किया। उन्होंने 300 गुर्दा दाताओं से प्रत्यारोपण ऑपरेशन के 6 से 132 महीने के बाद बात की। करीब 65 प्रतिशत दाताओं ने शिकायत की कि गुर्दे की बिक्री का उनके रोजगार पर विपरीत प्रभाव पड़ा है।
38 प्रतिशत ने, जिनमें अधिकतर दिहाड़ी मजदूर थे और जिनका किसी तरह का बीमा नहीं था, कहा कि प्रत्यारोपण के बाद वह उसी स्थान पर काम करने के लायक नहीं रह गए थे। इससे पता चलता है कि भारत में किस हद तक गुर्दा दाताओं का शोषण हुआ होगा। तमिलनाडु में दो गांवों के अधिकतर लोगों के पास एक ही गुर्दा है क्योंकि उन्होंने एक-एक गुर्दा बेच दिया। आज वे लोग भी ऐसी ही शिकायत कर रहे हैं और किसी को गुर्दा न बेचने की सलाह दे रहे हैं। इससे विपरीत स्वेच्छा से अंगदान करने वालों को कोई मलाल नहीं है और वे पूरी तरह प्रसन्नचित हैं।
इस कांड का खुलासा होने के बाद देश के अन्य हिस्सों से भी ऐसी रिपोर्ट आ रही हैं। पहले भी ऐसे घोटालों का पर्दाफाश हुआ था। अन्य देशों में भी ऐसे कुकृत्य हो रहे हैं। ऐसे में हमें डॉ. सर्वपल्ल्ली राधाकृष्णन के इन शब्दों को याद रखना चाहिए ‘विज्ञान ने बाहरी व्यक्ति को चमत्कृत किया है और आंतरिक व्यक्ति की उपेक्षा की है। इसने लालच एवं स्वार्थ का जन्म दिया है जिससे मूल्यों का संकट खड़ा हुआ है। यह आज विभिन्न प्रकार की बीमारियों और सामाजिक, राजनीतिक एवं अन्य परेशानियों की जड़ में है।’