जोधपुर.
देश के सूखे इलाकों में कृषि पैदावार बढ़ाने के प्रयासों में अब वैज्ञानिकों को ‘नैनो टेक्नोलॉजी’ के रूप में आशा की नई किरण नजर आई है। अब तक इलेक्ट्रोनिक्स, मेडिसिन, एनवायर्नमेंट, एनर्जी और बायो सेक्टर में क्रांति लाने वाली नैनो टेक्नोलॉजी को पहली बार एग्रीकल्चर सेक्टर में आजमाया जा रहा है। इसके नेतृत्व का जिम्मा जोधपुर स्थित केंद्रीय रुक्ष क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के वैज्ञानिकों को दिया गया है।
कई संस्थान मिलकर काम करेंगे : नेशनल एग्रीकल्चर इनोवेटिव प्रोजेक्ट के तहत होने वाली इस रिसर्च के लिए वल्र्ड बैंक पैसा देगा। रिसर्च ग्रुप में आईआईटी मुंबई, बिट्स पिलानी, पीएयू लुधियाना और आईआईएसएस भोपाल के वैज्ञानिक भी काजरी के साथ मिलकर काम करेंगे। इस प्रोजेक्ट पर लगभग 713 लाख रुपए का खर्च आएगा।
किसानों के लिए फायदेमंद : काजरी के प्रधान वैज्ञानिक डॉ.तरफदार बताते हैं-‘नैनो एप्रोच से हम रॉक फास्फेट से टॉक्सिक मेटल निकाल सकते हैं। यह फास्फोरस का एक ऐसा फर्टिलाइजर होगा, जिसकी प्रकृति में स्वत: रिसाइकलिंग होती रहेगी।
यानी किसान को बार-बार फर्टिलाइजर पर न तो पैसा खर्च करना पड़ेगा और न ही उसकी कमी से खेती प्रभावित होगी। मिट्टी को एक ऐसा कंडिश्नर भी मिलेगा, जो पानी की वाष्पोत्सर्जन दर से होने वाले नुकसान व उपयोगी मिट्टी के क्षरण की समस्या खत्म करने में मददगार साबित हो सकता है।’
इनका कहना है
‘नैनो टेक्नोलॉजी को एग्रो सेक्टर के लिए चुनौती माना जाता रहा है। हमें पूरा यकीन है कि अब जिस रिसर्च को शुरू किया जा रहा है, उसमें मिली कामयाबी एक नई हरित क्रांति को जन्म देगी।
- डॉ.ज.ेसी.तरफदार, प्रधान वैज्ञानिक, काजरी
ऐसे होगा इस्तेमाल
वैज्ञानिकों का मानना है कि देश के सूखे क्षेत्रों में कृषि पैदावार बढ़ाने में प्रतिकूल मौसम, मृदा में उर्वरा तत्वों व नमी की कमी और मृदा क्षरण जैसी समस्याएं आती हैं। इनका हल तभी संभव है, जब मृदा में उर्वरा शक्ति और नमी बनाए रखी जाए। इस प्रोजेक्ट में फास्फोरस, जिंक, आयरन और मैग्नेशियन के सिंथेसाइज नैनो पार्टिकल्स ईजाद किए जाएंगे।
इन पार्टिकल्स को फास्फोरस की अधिकाधिक उपयोगिता सुनिश्चित करने के लिए फर्टिलाइजर बनाने में उपयोग किया जाएगा, जिससे मृदा क्षरण रोकने व नमी बनाए रखने के लिए कवच बनाने की भी कोशिश होगी।