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सरकारी नहीं समस्याकारी हो गया सिम्स

बिलासपुर.patients शहरवासियों को उम्मीद थी कि यूनिवर्सिटी द्वारा संचालित सिम्स के शासनाधीन होने के बाद व्यवस्था में सुधार आएगा।लोगों की मांग के अनुरूप गत १ दिसंबर को राज्य शासन ने सिम्स को अधिग्रहीत कर लिया, लेकिन दो माह बाद भी सिम्स की व्यवस्था में सुधार नहीं आया। पांच सौ बिस्तरों वाले सिम्स में अव्यवस्था के कारण मरीज मजबूरन निजी चिकित्सा संस्थानों में महंगा इलाज कराते हैं।

पहले मरीजों ने जिला अस्पताल की ओर रुख किया, लेकिन जब वहां भी यही स्थिति दिखी, तो लोग जिला अस्पताल व सिम्स के बजाए जमीन मकान बेचकर या गिरवी रखकर निजी अस्पतालों में उपचार कराने विवश हैं। राज्य शासन द्वारा प्रदत्त सिम्स की ज्यादातर चिकित्सा उपकरण ठप पड़े हैं। पेट के अंदर दूरबीन या छाले देखने के लिए यहां स्थापित इंडोस्कोपी मशीन यूनिट से गायब है।

दूसरी मंजिल पर बनाए गए एक केबिन में इंडोस्कोपी कक्ष लिखा है, लेकिन मशीन ही नहीं है। बताया जाता है कि खराबी आने के कारण कंपनी के इंजीनियर मशीन को मरम्मत के लिए ले गए हैं। हार्ट बीट नापने की टीएमटी मशीन भी ठप पड़ी है। इसके अलावा पेट पर छोटे छेद के जरिए आपरेशन करने वाली लेप्रोस्कोपिक मशीन, आंत की जांच करने की कोलेलोस्कोपी मशीन, पेशाब की थैली की जांच करने की सिस्टोस्कोपी मशीन व गेस्ट्रोस्कोपी मशीन भी ठप पड़ी हुई है। इन मशीनों को एक कमरे में बंद करके कपड़ा ढंक दिया गया है। दवाइयों की हालत भी बदतर है, इनडोर व आउट डोर मरीजों को दवाइयां मेडिकल स्टोर्स से खरीदना पड़ रहा है।

मरीजों का कहना है कि अस्पताल से एक दो गोलियां ही दी जाती हैं। बाकी सब खरीदना पड़ता है। सिम्स प्रशासन को शहरवासियों द्वारा अपने मृतकों की पुण्य स्मृति में दी गई वाटर कूलर मशीनों की भी कदर नहीं है। अस्पताल में पेयजल के लिए एक भी नल नहीं है, मरीजों को इन वाटर कूलरों का ही सहारा है ज्यादातर वाटर कूलरों से टोंटियां ही गायब हैं, बंद पड़ी है, केवल कैस काउंटर के सामने की एकमात्र वाटर कूलर चालू है, इसके बंद होने से मरीजों के परिजनों को बाल्टी, बाटल लेकर आसपास के मुहल्लों में पीने के पानी के लिए भटकना पड़ता है।

क्या कहती हैं नर्से

वार्ड में डच्यूटीरत नर्से दवाओं की अनुपलब्धता को लेकर खासे परेशान हैं। नर्सों ने बताया कि उनके पास कोई भी एंटीबायटिक, बुखार व दर्द निवारक दवाइयां तक नहीं हैं। मरीज के रिश्तेदार तो सीधे उनसे झगड़ते हैं, वे यहां किन परिस्थितियों में काम करते हैं, वे ही जानती हैं। स्टोर में दवाओं के इंडेंट के लिए रजिस्टर भेजा जाता है, तो रजिस्टर में नाट एविलेबल लिखकर भेज दिया जाता है।

कुछ और मशीनों की भी शामत

सिम्स के सोनाग्राफी व इकोकार्डियोग्राफी यूनिट भी कभी भी ठप हो सकती है। जानकारों का कहना है कि इन मशीनों को निश्चित तापमान में रखने के लिए एसी का होना जरूरी है, इसके लिए कई बार लिखापढ़ी भी की जा चुकी है, लेकिन आज तक न तो यूनिवर्सिटी प्रशासन ने ध्यान दिया और नहीं सिम्स प्रबंधन ने यही एक सुविधा है, जो यहां सस्ते में सुलभ है, यदि यह मशीन भी ठप हो गई तो हार्ट के जांच की सुविधा के लिए भी लोगों को निजी संस्थानों में भटकना पड़ेगा।

एमआरडी का कोई माई-बाप नहीं

किसी भी मेडिकल कालेज की एमआरडी उस संस्थान की रीढ़ होती है, मेडिकल कालेज एक र्सिच सेंटर है, इसी के आधार पर पता चलता है, कि किस क्षेत्र में किस किस्म की बीमारी अधिक होती है, लेकिन सिम्स तो रीढ़ विहीन ही है, यहां की एमआरडी करीब एक साल से ठप पड़ी है। पूर्व में एमआरडी का काम ठेका कंपनी द्वारा किया जाता था, लेकिन यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा ध्यान न देने के कारण यह यूनिट भी ठप हो चूकि है। कंप्यूटर गायब हैं, इतने बड़े मेडिकल कालेज में मरीजों का मैन्युअल पंजीयन किया जा रहा है।

सवा करोड़ पानी में

अपोलो की तर्ज पर सिम्स के भर्ती मरीजों को बेड पर ही सिस्टमेटिक आक्सीजन देने व आपरेशन थियेटर में गैस सप्लाई के लिए सिम्स में भी सवा करोड़ की लागत से आक्सीडेशन प्लांट की स्थापना की गई है। इसके तहत पूरे अस्पताल में पाइप लाइन का जाल बिछाकर वाडरे में बिस्तर के उपर स्वीच बोर्ड लगाया गया है, लेकिन करीब साल डेढ़ साल से यह यूनिट धूल खाते पड़ी है।

कुत्ता काटे या सांप

सिम्स में कुत्ते व सांप काटने की दवाई कई महीने से नहीं है। बीच में कुछ इंजेक्शन यहां उपलब्ध थे, कलेक्टर के आदेश के बाद भी पीड़ितों को इंजेक्शन नि:शुल्क नहीं दिए गए। लगातार लोगों से शिकायत मिलती रही कि सिम्स के फार्मेसी विभाग के कर्मचारी कुत्ता काटने का इंजेक्शन बेच रहे हैं, परंतु प्रबंधन ने न तो इसकी जांच कराई और नहीं किसी पर कोई कार्रवाई की।

लिफ्ट नहीं करा रहा लिफ्ट

आए दिन ठप रहने वाली सिम्स के सर्जिकल बिल्डिंग की लिफ्ट फिर से ठप पड़ी है। लिफ्ट खराब होने के कारण मरीजों को तीन चार मंजिल उतना चढ़ना पड़ रहा है।

ऐसी की गई है खरीदी

यूनिवर्सिटी के कार्यकाल में मनमाने ढंग से मशीनो की खरीदी की गई है, इनमें से ज्यादातर मशीने आए दिन ठप रहती हैं, जो जांच का विषय है। ऐसे में सुविधाओं के होते हुए भी मरीजों को ज्यादातर जांच निजी संस्थानों में ही करानी होती है।

निजी एम्बुलेंसों के भरोसे चल रहा सिम्स

स्थापना के पांच साल बाद भी ९ वाहनों के होते हुए आज तक सिम्स में एम्बुलेंस सुविधा शुरू नहीं हो सकी है। यहां मात्र डाक्टरों को लाने ले जाने के लिए काल वाहन की सुविधा है, वह भी आए दिन ठप रहती है। निजी संस्थानों में जांच सुविधाओं के लिए मरीज के रिश्तेदारों को निजी संस्थानों से भारी भरकम किराए पर एम्बुलेंस बुलाना पड़ता है। रेडक्रास व सांसद मद के २३ लाख रुपए से खरीदी गई ट्रामा एम्बुलेंस का उपयोग केवल व्हीआईपी डच्यूटी पर ही किया जाता है।

सिस्टम है, प्रोब नहीं

सिम्स के सर्जरी विभाग के लिए सिम्स प्रबंधन द्वारा अलग से सोनोग्राफी मशीन की खरीदी की गई थी, ताकि मरीजों को जांच के लिए भटकना न पड़े। कंपनी ने मशीन की सप्लाई तो कर दी लेकिन जांच के लिए उपयोगी प्रोब आज तक नहीं दिया, जिसके कारण दो ढाई लाख की सर्जरी यूनिट की सोनोग्राफी मशीन आज भी डब्बे में बंद पड़ी है।

मौत के बाद मिलती है रिपोर्ट

सिम्स में सिटी स्केन व एक्सरे तथा सोनोग्राफी के जांच की सुविधा तो उपलब्ध है, लेकिन रिपोर्टिग व्यवस्था का हाल बेहाल है। आमतौर पर डाक्टर मरीजों की स्थिति गंभीर होने या गंभीरता की शंका पर ही सीटी स्केन या सोनोग्राफी कराने की सलाह देते हैं, लेकिन विभाग के डाक्टरों द्वारा २-३ दिन तक रिपोर्टिग तक नहीं दी जाती। डाक्टर फिल्म देखकर अंदाज से मरीजों का इलाज करते हैं। रिपोर्ट या तो मरीज के अवकाश के बाद मिलता है, या फिर अस्पताल से छुट्टी होने के बाद।

अफसरों की बात

इस मामले में जानकारी के लिए सिम्स के प्रभारी डीन डा. एसके मोहंती से चर्चा करने का प्रयास किया गया परंतु उनसे संपर्क नहीं हो सका। ‘सिम्स के प्रभारी एमएस डाक्टर डीआर पाटले का कहना है कि मशीनों की खराबी के संबंध में डीन कार्यालय को सूचित किया गया है। दवाइओं की खरीदी हेतु उनंकी सूची एप्रूव्ल के लिए भेजी गई है। आक्सीजन प्लांट के संबंध में जानकारी डीन कार्यालय से ही मिल पाएगी।’





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