लुधियाना.
‘जदों मिट्टी वाजां मारदी, तां कोई रूक नी सकदा..’ कुछ ऐसा ही कहना है किला रायपुर के रूरल ओलंपिक गेम्स में पहुंचे दर्जनों एनआरआइज का। बचपन के यारों को मैदान में जोर लगाता हुआ देखने के लिए सात समुंदर पार से कई आप्रवासी भारतीय यहां पहुंचे हुए हैं। ग्रामीण खेलों को जिंदा रखने के लिए यह लोग मौके पर ही हजारों का ईनाम बांट रहे थे ताकि युवा खेलों में ज्यादा से ज्यादा भाग ले और इनकी पहचान बनी रहे।
बैंकुवर में अच्छा बिजनेस चला रहे सतपाल चट्ठा खास तौर पर यह खेल देखने भारत आए हैं। उन्होंने कहा, ‘बचपन यहीं गुजरा है। पहले दूसरों को कबड्डी और रस्साकशी करते देखते थे। अब दोस्त इसमें भाग लेते हैं। बात अपनी मिट्टी की है, इसलिए रुका नहीं जाता।’
चट्ठा ने कहा कि विदेश में आइस हॉकी और रग्बी के अलावा कबड्डी होती तो है लेकिन यहां के माहौल की बात ही कुछ और है। ऐसा बाकी कहीं नहीं दिखता। अमेरिका की एक तेल कंपनी में बतौर मैनेजर कार्यरत कमलजीत बंदिश भी सिर्फ गेम्स देखने के लिए आए हैं।
उन्होंने कहा कि खेल देखने का जितना मजा यहां आ रहा है, उतना दुनिया में कहीं नहीं मिल सकता। मूल रूप से मोगा के मंगेवाड़ा गांव के निवासी कमलजीत बोले, ‘यहां होने वाली बैलगाड़ी दौड़ तो लाजवाब है। रविवार को होने वाला फाइनल मुकाबला अपने आप में अनूठा होगा।
विदेश में हार्सरेस के दौरान जॉकी तमाम सुरक्षा प्रबंध करके घोड़े पर बैठता है जबकि हमारे यहां घुड़सवार कलेजा हाथ में लेकर घोड़े दौड़ाते हैं।’ टोरंटो में बस चुके ऋषिपाल बचपन में स्कूल लेवल पर हॉकी टीम की कप्तानी कर चुके हैं और जवानी में भी अच्छे हॉकी खिलाड़ी माने जाते थे।
उन्होंने कहा, ‘पंजाब के युवाओं को नशे से दूर ले जाने की रूरल ओलंपिक की कोशिश काबिले तारीफ है। यूं तो दिल हमेशा अपने गांव आने को करता है लेकिन मौका सिर्फ सर्दियों में मिल पाता है।’अमेरिका से आए सुक्खी, कनाडा से करन, परमजीत ग्रेवाल, यूएसए के कंवल, सुखदेव सिंह, सर्वजीत सब्बा और गोविंद्र सिंह ग्रेवाल समेत कई एनआरआई खेल मुकाबलों के दौरान मैदान में हूटिंग करते हैं।