मिट्टी की सौंधी महक से आत्मीय रिश्ता रखने वाले बाबा आमटे (मुरलीधर देवीदास आमटे) ने चंद्रपुर जिले, महाराष्ट्र के वरोरा के निकट आनंदवन नामक अपने आश्रम को आधी सदी से अधिक समय तक विकास के विलक्षण प्रयोगों की कर्मभूमि बना डाला। जीवनपर्यन्त कुष्ठरोगियों, आदिवासियों और मजदूर-किसानों के साथ काम करते हुए उन्होंने वर्तमान विकास के जनविरोधी चरित्र को समझा और वैकल्पिक विकास की क्रांतिकारी जमीन तैयार की।
उनका जन्म 26 दिसंबर 1914 में हुआ था लेकिन उनका जीवन दर्शन और काम तो बताता है कि वे संभवत: 21 वीं सदी के उत्तरार्ध में आए थे। ठीक उसी तरह जैसे कई मायनों में गांधीजी भी अपने समय से पहले आ गए थे। सन 1908 में गांधीजी द्वारा लिखी गई विश्वप्रसिद्ध ‘हिन्द स्वराज’ किताब का जब सन 1921 में दूसरा संस्करण निकला तो उसकी प्रस्तावना में गांधीजी ने स्वयं लिखा कि उसमें मानव सभ्यता, विकास और अर्थशास्त्र पर जो सवाल खड़े किए गए हैं, उनके लिए हिंदुस्तान अभी तैयार नहीं है। बाबा आमटे ‘हिन्द स्वराज’ की ही राह पर चले।
जब नर्मदा नदी को सरदार सरोवर बांध से बांधा जा रहा था और उसके किनारे हजारों साल से पनपी जनसंस्कृति को उजाड़ा जा रहा था तब बाबा इतने विचलित हो गए कि वे आनंदवन आश्रम छोड़कर मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में नर्मदा के तटपर छोटी कसरावाद नामक गांव में एक झोपड़ी बनाकर बस गए। वे मेधा पाटकर के नेतृत्व में चल रहे नर्मदा बचाओ आंदोलन के न केवल प्रेरणास्रोत बन गए, बल्कि नौजवानों की उस फौज के साथ धरना-रैलियों में सक्रिय हिस्सा लेने लगे। यह सब करते हुए उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उनकी रीढ़ की हड्डी में पुरानी तकलीफ के कारण वे बैठ तक नहीं पाते थे- या तो लेट पाते थे या खड़े हो पाते थे।
सरकार, राजनैतिक दल और मीडिया कभी समझ नहीं पाए कि उनकी असली लड़ाई केवल बड़े बांधों या नर्मदा घाटी के गांव व मजदूर-किसानों के उजाड़ने के खिलाफ नहीं थी। ये मुद्दे तो जन-विरोधी विकास, उपभोग पर टिकी जीवनशैली और गैर-बराबरी बढ़ाने वाली आर्थिक नीतियों के प्रतीक बन गए थे। गांधीजी ने ‘हिन्द स्वराज’ लिखकर पश्चिम के पूंजीवादी देशों और भारत की आजादी की लड़ाई के नेताओं को इन्हीं के प्रति सावधान किया था। बाबा आमटे ने भी न्यायपूर्ण व प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर टिकी जीवनशैली एवं वैकल्पिक विकास का परचम फहराने के लिए कमरकस ली थी।
वैश्वीकरण, बाजारवाद और निर्बाध उपभोग की बेतहाशा दौड़ में भारत के शासक वर्ग ने न तो गांधीजी को समझा और न ही बाबा की आवाज सुनी। सरदार सरोवर भी ऊंचा होता रहा, नर्मदा को बांधने के लिए नये बांध भी बनते रहे एवं देश की अन्य नदियों को इसी तरह बांधने की आए दिन नई घोषणाएं होती रहीं। इन बांधों से उजड़े गांवों और किसानों के पुनर्वास की क्या बात करें, अभी तो सन् 1972 में नर्मदा पर बने तवा बांध के विस्थापित आदिवासियों का पुनर्वास शुरू तक नहीं हुआ है।
खेतों की सिंचाई और उसके लिए रासायनिक खाद की रोज बढ़ती जरूरत न तो सरदार सरोवर से लाभान्वित होने वाले गुजरात में शांत हुई और न ही देश के अन्य इलाकों में, जहां हरित क्रांति का मॉडल थोपा जा रहा है। ऊर्जा का संकट तो अब नाभिकीय ऊर्जा बतौर भारत की संप्रभुता पर खतरा बनता जा रहा है। सेज का पागलपन नीति निर्माताओं के सिर पर नाच रहा है। विकास के इस मॉडल से न तो पर्याप्त रोजगार पैदा हो रहा है और न गरीबी ही दूर हो रही है। हरित क्रांति के बावजूद हजारों किसानों की आत्महत्या वाला विदर्भ दुनियाभर में विकास की इस विकृति का एक क्रूर मजाक बन चुका है।अब तो पूरी दुनिया वैश्विक गर्माहट के खौफ में है और पानी सिर के ऊपर से निकल चुका है।
आज नदी के किनारे बसी जनसंस्कृति को बचाने और प्रदूषण को कम करने के नाम पर महंगे सेमिनार-सम्मेलनों का जो नया दौर शुरू हो रहा है, उसकी सोच बड़े बांधों से नष्ट हो रही कुदरत व जनसंस्कृति एवं विकास के मॉडल से कटकर है। यह न केवल अधकचरी है, बल्कि भ्रम भी फैलाती है। यह वैश्विक पूंजी के खतरनाक नजरिये से उपजी है। बाबा आमटे के दर्शन से हम इतना सबक तो लें कि पूंजीवादी और बाजार अर्थव्यवस्था पर टिके विकास के मॉडल की समीक्षा करना एवं एक वैकल्पिक मॉडल की ईमानदारी से खोज करना प्राथमिकता बन चुका है। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
बाबा आमटे के ‘भारत जोड़ो’ आंदोलन को भी याद कर लेना सटीक होगा। उन्होंने भारत को सच्चे मायने में एक बहुसांस्कृतिक, बहुधर्मी, बहुनस्ली और बहुभाषी देश के रूप में पहचाना। किसी एक धर्म, नस्ल, जाति, क्षेत्र या भाषा के वर्चस्व की बात करना न केवल बेमानी होगा वरन भारत की अवधारणा को नकारना भी। जुलाई 1988 में आनंदवन में बड़े बांधों के सवाल पर हुई एक राष्ट्रीय बैठक में ही उन्होंने ‘भारत जोड़ो’ का जिक्र किया। भारत की विविधता के साथ बड़े बांधों के सवाल को जोड़ते हुए उन्होंने प्रौद्योगिकी और जनज्ञान की विविधता के सवाल को भी इस यात्रा में उठाया कि यह विकास जनता को बांटता है-एक तरफ बांध से लाभान्वित होने वाले लोग और दूसरी तरफ उजड़ने वाले लोग।