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संवेदनहीन समाज के लिए संजीवनी

बसंत पंचमी विशेष. शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यगं्रथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है। यह पर्व मौसम के बदलाव के साथ-साथ नए रंगों, गंधों, नए-नए पुष्पों के साथ बासंती हवाओं का झोंका फिजाओं में नई स्फूर्ति, उत्साह, उमंग और खास प्रकार की मादकता लेकर आता है, इसीलिए इसे मदनोत्सव भी कहते हैं।

कामशास्त्र में ‘सुवसंतक’नामक उत्सव की चर्चा आती है। ‘सरस्वती कंठाभरण’ में लिखा है कि सुवसंतक वसंतावतार के दिन को कहते हैं। वसंतावतार अर्थात जिस दिन बसंत पृथ्वी पर अवतरित होता है। वास्तव में बसंत पंचमी ही वसंतावतार की तिथि है। ‘मात्स्यसूक्त’ और ‘हरी भक्ति विलास’ आदि ग्रंथों में इसी दिन को बसंत का प्रादुर्भाव दिवस माना गया है। इसी दिन मदन देवता की पहली पूजा का विधान है।

कामदेव की मधुऋतु का यह उत्सव वाक् विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की आराधना का, कला तथा विज्ञान की दृष्टि से राग-सौंदर्य का, प्रकृति की सम्मोहनी छटा का आनंद पर्व है। कामदेव के पंचश्वर (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) प्रकृति संसार में अभिसार को आमंत्रित करते हैं। विद्वानों का मत है कि बसंत दुर्निवार उत्कंठा का पर्व है, जिसमें एक खास प्रकार की मस्ती व मादकता होती है। यह पर्व पुष्प मास का पर्व है, गुलमोहर मदार के लाल-पीले पुष्प, बसंतरानी के चमकदार पीले फूल, कुंद व किंशुक गुलाब के फूल बसंत की शोभा बढ़ाते हैं। पपीहे और कोयल की कूक दसों-दिशाओं को नए स्वर से बांध देती है। गांव के सिवानों में सरसों के फूलों का समंदर लहराता है और अमराइयों में बौर आने से हवा में एक नशा सा घुला होता है।

वास्तव में मन के प्राकृत आवेगों को स्पंदित करने वाली चेतना का स्फुरण बसंत के आगमन पर भरपूर हो सकता है, बशर्ते रस, रंग और गंध की ओजस्विता का अहसास हो। यह मौसम ही ऐसा है कि गमकती आम मंजरियों, रंगों से भरे खेत और नशीली हवाओं की गंध, युवा हो या बूढ़ा भीतर तक झकझोर जाती है। कवि इसी अहसास को शब्द देता है। यही कवि की काव्य दृष्टि है। कालीदास से लेकर निराला तक अनेक संस्कृत-हिन्दी कवियों ने बसंत का उल्लेख अपनी कविताओं में किया है।

वास्तव में बसंत एक राग है। मनुष्य की रागात्मक वृत्ति को उत्तेजित करने के कारण बसंत कामदेव का सखा है। सच पूछिए तो बसंत यौवन, प्रेम, उमंग और उत्साह का राग है। परंतु वैश्वीकरण के बाजारवाद के दौर में बसंत का रंग फीका पड़ रहा है। प्रकृति के सहज परिवेश के समानांतर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया फूहड़ बाजारू दृश्य, गीत और संगीत को परोस रहे हैं। विज्ञापन के मॉडलों, सिनेमा नायिकाओं के नंगे-अधनंगे अंगों को पर्दे से पोस्टर तक दिखाया जा रहा है। इन नायिकाओं की बॉडी लैंग्वेज अलग है। महानगरों-नगरों में प्लास्टिक के फूलों और पांच सितारा होटलों के बगीचों में बसंत ढूंढ़ने का उपक्रम हो रहा है। पूंजीवादी समाज के बढ़ते दबाव में प्यार, भ्रातृत्व, मिठास और मानवीय संवेदनाएं लुप्त हो रही हैं। यह एक चिंता का विषय है।

बसंत एक भाव दशा है। यह एक पवित्र पर्व है। बसंत सिर्फ वेग ही नहीं एक जीवनधारा है। उत्तर आधुनिकता और वैश्विक संस्कृति की आंधी कहीं बसंत पर छा न जाए इसलिए हजारों साल के इस जीवंत पर्व को बचाए रखने की जरूरत है। बसंत संवेदनहीन समाज के लिए संजीवनी है। सुगंध है, एक जीवन दर्शन है। एक महान लौकिक पर्व है। हमें समूची परंपरा और संस्कृति के साथ इसे बचा कर रखना होगा, क्योंकि बसंत हमारी थाती है।

-लेखक काशी विद्यापीठ, वाराणसी के भारतीय भाषा विभाग में प्रोफेसर हैं।





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