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हरी-हरी वसुंधरा पे नीला-नीला ये गगन

शांतारामजी की फिल्म ‘बूंद जो बन गई मोती’ में बसंत उत्सव की भावना इस सुंदर गीत में प्रस्तुत की गई थी-‘ये कौन चित्रकार है, ये किस कवि की कल्पना का चमत्कार है, हरी-हरी वसुंधरा पे नीला नीला ये गगन हवाएं ये मदभरी गुनगुना रहा है चमन ..ये कौन चित्रकार है..(भरत व्यास)।’ यह गीत भावविहीन जीतेंद्र पर फिल्माया गया था और कश्मीर में बसंत ऋतु के सौंदर्य से ओतप्रोत था। शिशिर भादुड़ी के नाटक पर आधारित ‘सीता’ के बाद न्यू थिएटर्स ने ‘विद्यापति’ का निर्माण किया था।

बसंत उत्सव में राजा कवियों और चित्रकारों को राजधानी मिथिला में आमंत्रित करते हैं। उनके बचपन के मित्र कवि विद्यापति का काव्य सभी को मंत्रमुग्ध कर देता है। राजा के निमंत्रण पर कवि विद्यापति राजमहल में अतिथि के रूप में ठहर जाते हैं। राजा युद्ध पर जाते हैं और रानी कवि की ओर आकृष्ट हो जाती है। विजयी होकर लौटने पर राजा को महामंत्री प्रेम में उनकी हार की खबर देता है और दोनों को मृत्युदंड देने की प्रार्थना करता है। राजा जानता है कि रानी विद्यापति की प्रेरणा है और उनका रिश्ता आध्यात्मिक है।

यह कितनी अजीब बात है कि पृथ्वीराज कपूर ने 1929 में मृच्छकटिकम’ (नाटककार शूद्रक) नामक नाटक में काम किया था और उनके पुत्र शशिकपूर ने इसी विषय पर आधारित फिल्म ‘उत्सव’ 1984 में बनाई थी। गिरीश कर्नाड ने ‘उत्सव’ में एक और कथा जोड़ी। पूरा घटनाक्रम बसंत उत्सव के दरमियान घटित होता है और ‘मदन रंग लायो रे’ गीत को लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने कमाल का रचा है।

इसी फिल्म में बसंत उत्सव के नशे में बसंतसेना कवि के घर पहुंच जाती है और कवि उसके गहने उतारने के प्रयास में स्वयं गहनों में उलझ जाता है। कवि की पत्नी और प्रेमिका गीत गाते हैं-‘मन क्यों बहका रे आधी रात को,बेला महका रे? लता और आशा ने समयाभाव के बहाने यह गीत अलग-अलग रिकार्ड कराया परंतु संगीतकारों का जीनियस है कि आवाजें गलबहियां करती सी ध्वनित होती हैं।

अकबर के दौर में बसंत ऋतु को मनाने के लिए मीना बाजार की रचना की गई, जिसमें महल की सब औरतें परदे की कैद से मुक्त दुकानदारों की भूमिका निभाती थीं और पुरुष खरीदार होते थे। यह चुहलबाजी का अवसर होता था। कहा जाता है जोधाबाई की प्रेरणा से यह आयोजन किया गया। आशुतोष गोवारीकर की फिल्म ‘जोधा-अकबर’ में इसका दृश्य है। यकीन किया जा सकता है कि एआर रहमान ने बसंतोचित गीत रचा होगा।

शांतारामजी की ‘झनक-झनक पायल बाजे और ‘नवरंग’ में भी बसंत की छटा देखने को मिलती है। बसंत देसाई ने कमाल का माधुर्य रचा है झनक-झनक में। होली भी बसंत का ही हिस्सा है और अनगिनत फिल्मों में इसे प्रस्तुत किया गया है। फिल्म ‘मदर इंडिया’ का गीत ‘होली आई रे कन्हाई, रंग छलके, सुना दे जरा बांसुरी’ और ‘नवरंग’ में ‘अरे जा रे हट नटखट ना छू रे मेरा घूंघट’ भी अद्भुत रचना है।

कालिदास के बसंत वर्णन के समकक्ष रचना कभी किसी ने नहीं की, परंतु बसंत ऋतु का मानवीकरण सुमित्रानंदन पंत ने इस तरह किया है-‘चंचल पग दीपशिखा के घर, गृह मग वन में आया बसंत, सुलगा फाल्गुन का सूनापन, सौंदर्य दिशाओं में अनंत।’

हमने प्रकृति को इतना लूटा है कि अब बसंत केवल साहित्य और सिनेमा में ही जिंदा है और प्रकृति के सबसे सुंदर रूप को ही मनुष्य के लालच ने हर लिया है। इसके बावजूद भी हम अंग्रेज कवि शैली पर यकीन करें ‘इफ विंटर कम्स, कैन स्प्रिंग बी फार बिहाइंड..’ इस वर्ष की सघन ठंड से रोशन बसंत की उम्मीद की जा सकती है।





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