दृष्टिकोण. भारत-अमेरिका परमाणु करार की कठिनाइयों के बीच कांग्रेस के नेता गठबंधन सरकार की मुश्किलों का रोना रो रहे हैं। बातें कुछ इस तरह से की जा रही हैं, मानो गठबंधन सरकार देश के लिए नुकसानदेह है। इस तरह की भावनाएं व्यक्त करते समय इस सचाई को भी स्वीकारना चाहिए कि देश की राजनीति गठबंधन के एक ऐसे दौर में पहुंच गई है, जहां से इसकी वापसी आने वाले कुछ दशकों में संभव नहीं लगती।
यही नहीं, प्रत्येक चुनाव के बाद केंद्र में गठबंधन की राजनीति और भी जटिल होती जाएगी। इसलिए इस जटिलता से भागने की बजाय यदि हम इसकी चुनौतियों को स्वीकार करें, तो देश के लोकतंत्र का ज्यादा भला होगा। आखिर गठबंधन की राजनीति के दौर में यह देश पहुंचा कैसे? कभी कांग्रेस का एकछत्र शासन होता था। अधिकांश तथा कभी-कभी सभी राज्यों में इसकी सरकारें होती थीं, लेकिन आज कितने प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें हैं? केंद्र में सरकार कांग्रेस की जीत के कारण नहीं, बल्कि गठबंधन के कारण बनी है।
कांग्रेस प्रत्येक चुनाव के बाद अपना जनाधार खोती जा रही है। इसका कारण यह है कि कांग्रेस में कभी सभी क्षेत्रों के बड़े-बड़े नेता होते थे, लेकिन धीरे-धीरे सभी क्षेत्र के नेताओं को समाप्त कर दिल्ली में बैठे आलाकमान ने सबकुछ अपने पास केंद्रित कर लिया। इसका असर सामने आया देश के विभिन्न क्षेत्रों में कांग्रेस की समाप्ति की शुरुआत और क्षेत्रीय दलों के उदय के रूप में। अब ये क्षेत्रीय पार्टियां, जिनके बूते कांग्रेस सत्ता में है, उसे (कांग्रेस को) नहीं सुहा रही हैं, इसलिए वह इच्छा व्यक्त कर रही है कि फिर से देश की जनता उसे अपने बूते सत्ता दे दे।
लेकिन राजनीति का जो चक्र चल रहा है, उसे उलटा नहीं जा सकता। गठबंधन राजनीति देश के लोकतंत्र की नियति बन गई है और इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा। यह कहना भी तथ्य से परे है कि गठबंधन राजनीति से देश को नुकसान हो रहा है। गठबंधन की राजनीति इसलिए अस्तित्व में आई है कि भारतीय लोकतंत्र का मिजाज ही गठबंधनवादी है। देश की बहुलतावादी संस्कृति और विविधतावादी पहचान गठबंधन की राजनीति के तहत ही इसके लोकतंत्र में पूरी तरह परिलक्षित होती है।
आंदोलन के रूप में कांग्रेस ने देश के भौगोलिक विस्तार में अपने आपको फैलाया था। आंदोलन के इतिहास के कारण कांग्रेस एक पार्टी नहीं, बल्कि कई पार्टियों के मेल से बनी एक बहुलतावादी पार्टी थी। उड़ीसा के बीजू पटनायक, उत्तर भारत के चौधरी चरण सिंह, बाबू जगजीवन राम जैसे नेताओं द्वारा कांग्रेस को छोड़ने में इसके पतन की कहानी लिखी है। बहुलतावाद को समाहित करने वाली एक पार्टी के रूप में इसकी समाप्ति के बाद भारतीय लोकतंत्र का बहुलतावाद गठबंधन राजनीति के रूप में उभर रहा है।
यह कहना गलत है कि एक पार्टी की सरकार से देश की समस्याओं के समाधान आसानी से निकल आते हैं। हरियाणा और पंजाब के बीच समस्या बने सतलुज के जल का बंटवारा न होना इसका उदाहरण है। जब केंद्र, पंजाब और हरियाणा में एक साथ कांग्रेस की सरकारें थीं, तब भी इसका समाधान नहीं निकल पाया। यही बात कावेरी जल बंटवारे पर भी लागू होती है। कावेरी जल पर कर्नाटक और तमिलनाडु में विवाद १८९क् से ही है। आजादी के बाद के अनेक वर्षो तक तमिलनाडु, केंद्र और कर्नाटक में कांग्रेस की सरकारें हुआ करती थीं। यदि एक पार्टी की सरकार के कारण समस्या का समाधान आसान होता, तो कावेरी समस्या का समाधान कब का निकल आया होता।
सचाई यह है कि देश में अनेक महान और युगांतरकारी काम गठबंधन सरकारों के दौर में ही हुए हैं। जब इंदिरा गांधी की सरकार १९६क् के दशक के अंतिम वर्षो में अल्पमत में आकर कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन की मोहताज हो गई, तो देश में अनेक कल्याणकारी काम शुरू हुए। मंडल आयोग की सिफारिशें वीपी सिंह सरकार के समय लागू की गईं, जो एक गठबंधन की सरकार थी। १९९६ के बाद संयुक्त मोर्चा की गठबंधन सरकार के दौर में गरीबों के लिए लाल कार्ड की योजना बनी और १९९८ के बाद राजग गठबंधन सरकार के तहत तीन प्रदेशों- झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तरांचल का गठन हुआ।
दरअसल क्षेत्रीय आकांक्षा और अनेक कमजोर समुदायों की आकांक्षाओं की पूर्ति गठबंधन सरकार के दौर में ही होती है। अनेक जटिल समस्याओं का समाधान भी गठबंधन सरकार के दौर में होता है। भारतीय जनता पार्टी राम जन्मभूमि, संविधान की धारा ३७क् और समान सिविल कोड जैसे मसलों को गठबंधन की राजनीति के तहत ही त्यागने के लिए तैयार हुई। हालांकि भाजपा अपने पार्टी एजेंडे से राम जन्मभूमि के मसले को नहीं हटाने की बात कर रही है, लेकिन जब राजग के अंदर आने के बाद उस पर गठबंधन की राजनीति की विवशताओं का दबाव पड़ता है, तो उसे उस एजेंडे को अपने तक ही सीमित रखना पड़ता है।
इसलिए समस्या गठबंधन से नहीं होती है, समस्या तब पैदा होती है जब कोई पार्टी गठबंधन राजनीति के धर्म का उल्लंघन करने लगती है। कांग्रेस को आज लगता है कि केंद्र की सरकार उसकी अपनी सरकार है, लेकिन वह एक गठबंधन सरकार है, जो वामदलों के बाहरी समर्थन से चल रही है। उस सरकार के नीतिगत मार्गदर्शन के लिए एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम बना हुआ है।
आज उसकी समस्या उसके सहयोगी या समर्थक दल नहीं हैं, बल्कि उन कार्यक्रमों से भटककर सरकार खुद अपने लिए समस्या खड़ी कर रही है और कहती है कि साझा सरकारें काम नहीं कर सकतीं। सवाल उठता है कि देश का लोकतंत्र आपको जो करने की इजाजत ही नहीं देता वह आप करना ही क्यों चाहते हैं? जब सरकार को बिना किसी संदेह के यह पता है कि संसद की राय भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित परमाणु करार के पक्ष में नहीं है, तो उसे उस करार से अपने को अलग कर लेने में क्या परेशानी है? आखिर वह ऐसा क्यों समझती है कि देश की चिंता सिर्फ उसे ही है, अन्य लोगों को नहीं।
तो समस्या गठबंधन राजनीति में नहीं है, बल्कि समस्या अपने को लोकतांत्रिक संस्कारों से परे रखकर सरकार चलाने में है। भारत के बहुलतावाद में एक पार्टी या दो पार्टी के लोकतंत्र की कोई जगह नहीं है। यहां सैकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं। अनेक राज्य हैं, हजारों जातियां हैं। अनेक समुदाय हैं और एक राष्ट्रीय आकांक्षा के साथ सबकी अपनी-अपनी अलग आकांक्षाएं भी हैं। इन सबकी पूर्ति गठबंधन राजनीति से ही संभव है। अच्छा हो पार्टियां इस हकीकत को स्वीकार कर लें।
-लेखक जनता दल (यू) के अध्यक्ष हैं।