संपादकीय. अब सारी दुनिया ग्लोबल वार्मिग की चिंता में दुबली हो रही है और उससे निपटने के उपाय तलाशने में जुटी है तब उसके एक बड़े हिस्से का ग्लोबल कूलिंग से दो-चार होना एक ऐसी हकीकत है जो मौसम विज्ञानियों और पर्यावरणविदों को जलवायु परिवर्तन संबंधी अपनी भविष्यवाणियों पर नए सिरे से विचार करने को मजबूर कर सकती है।
हालांकि यह बिरादरी ग्लोबल कूलिंग को ग्लोबल वार्मिग का ही नतीजा और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मौसम में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव को पृथ्वी के वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों के लगातार बढ़ते जमाव का प्रतिफल मानती है मगर ग्लोबल वार्मिग को एक विभीषिका को रूप में पेश किए जाने पर दुनिया एकमत नहीं है। मौसम विज्ञानियों और पर्यावरणविदों के सुदूर भविष्य संबंधी आकलनों को गंभीरता से नहीं लिया जाता तथा समाजशास्त्रियों व अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग ग्लोबल वार्मिग की समस्या को बढ़ा-चढ़ाकर बयान किए जाने को निहित स्वार्थो से जोड़कर भी देखता है।
ख्यात अर्थशास्त्री स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर के शब्दों में, ‘ग्लोबल वार्मिग आंदोलन अब खरबों डॉलर का उद्यम बन चुका है। इसमें हजारों नौकरियां मिलने की संभावनाएं तो हैं ही, स्वयंसेवी संगठनों और थिंक टैंकों को करोड़ों डॉलर के कोष, ऊंचे-ऊंचे पद व पुरस्कार तथा मीडिया में विभीषिका संबंधी भविष्यवाणियों को व्यापक कवरेज मिलने की संभावनाएं भी निहित हैं।’ अंकलेसरिया की मानें तो ग्लोबल वार्मिग का हौवा बगैर किसी ठोस वैज्ञानिक आधार के खड़ा किया जा रहा है और मीडिया को इसके संभावित परिणामों को विभीषिका के रूप में पेश करने से परहेज करना चाहिए।
बहरहाल, जब तक हम मौसम को अपने वश में नहीं कर पाते हैं तब तक हमें उसके तीखे तेवरों को अपनी नियति के रूप में स्वीकार करना ही होगा। रेगिस्तान में बर्फबारी या फिर आम तौर पर गर्म रहने वाले इलाकों में शीत लहर इन इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए कहर बनकर आई है जिन्हें फौरी तौर पर राहत और मदद की जरूरत है। सरकार और उसका तंत्र अपने स्तर पर यह काम कर ही रहा है, हम सबको भी इस काम में सामथ्र्य भर योगदान देकर अपनी जिम्मेदारी निभाने में देर नहीं करनी चाहिए।