इंदौर. राम सेतु को लेकर कवि-कवयित्रियों का जमघट था कृष्णपुरा छतरी पर। संस्था रिमझिम की प्रस्तुति राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में शनिवार रात राम को लेकर भावनाओं के ज्वार ने कड़कड़ाती ठंड की रात में गरमाहट ला दी। कवि माणिक वर्मा और जगदीश सोलंकी ने देर रात अपनी शानदार अभिव्यक्ति से श्रोताओं को तालियां बजाने पर मजबूर किया।
उनकी मांग पर जहां माणिक वर्मा ने मांगीलाल और मैंने जैसी रचना सुनाईं तो जगदीश सोलंकी ने तिरंगा और बदनाम बस्ती जैसी रचनाएं सुनाकर श्रोताओं में जोश और शर्मिदगी के भाव भी जगाए। युवा सितारे जॉनी बैरागी ने व्यंग्य की फुलझड़ियां छोड़ते हुए कविताएं सुनाईं। उनके बेबाक व्यंग्यात्मक चुटीली चुटकियों ने श्रोताओं को हंसने पर मजबूर किया। सत्यनारायण सत्तन अध्यक्षता की कुर्सी संभाले रातभर टाइम-टाइम पर फुलझड़ियां छोड़कर लोगों को हंसाते रहे।
माणिक वर्मा, जगदीश सोलंकी, अब्दुल गफ्फार, चंचल जौनपुरी, राणा जेबा, रश्मि किरण, लाड़सिंह गुर्जर, कमलेश दवे, फिरोज सागर, गोपालकृष्ण माहेश्वरी सहित अन्य कवियों ने अपनी रचनाओं के रंग बिखेरे। उनके साथ संचालन कर रहे सत्येन वर्मा सत्येन ने भी चुहलबाजी से कवि सम्मेलन को बोझिल नहीं होने दिया।
लाड़सिंह गुर्जर ने सरस्वती वंदना से शुरुआत की। कर दे यूं मन को कोमल, वह पाएं हम गीत-गजल और हम हो जाएं सफल
आराधना से माहौल बनाना शुरू किया। सत्यनारायण सत्तन ने करुणानिधि पर टिप्पणी कर रामसेतु के लिए कहा- आवाज जो उठी है कश्मीर ही क्या पाकिस्तान हमारा है। उनकी बुलंद आवाज तालियों की गड़गड़ाहट में खो गई। श्रोता समूह जोश से भरकर राम के जय-जयकार करने लगा। सत्तन ने चुटकी लेते हुए कहा- चोटों पर चोटें सहकर भी हिम्मत कभी न हारा है इसीलिए तो हिंदुस्तान हमारा है।
कमलेश दवे ने व्यंग्य की धार में हास्य का पुट मिलाते हुए सुनाया- अब धनवानों में गिनती है जो कल मारे-मारे फिरते थे आज समय उनके कीमती हैं।
अब्दुल गफ्फार ने जोशीले स्वरों में राम की जय-जयकार करते हुए अपनी रचनाएं सुनाईं- ओ हठधर्मी, बेशर्मी अभिमानी सुन दक्षिण की राजनीति के खलनायक सुन, क्या सोचकर तुमने पूजा की थाली में पत्थर मारा है क्या सोचकर तुमने श्रीराम की वास्तविकता को नकारा? जिसने दुश्मन तक को प्रिय माना, शबरी के झूठे बेरों में जीवन का रस पहचाना तुमने उनको गाली दी, इससे तो लगता है कि तुम भारत की औलाद नहीं। उनकी रचनाएं सुनकर श्रोता तालियां बजाते रहे।
जॉनी बैरागी ने अपना वैराग छोड़कर किस्सों के सहारे कविताएं बुनते हुए श्रोताओं पर अपना जादू चलाया। ठेठ मालवी अंदाज में चुटकियां लेते हुए उन्होंने व्यंग्य की नैया में अपनी कविताएं बहाईं। चुटकियां लेते हुए उन्होंने रिश्वत और भ्रष्टाचार के संदर्भ में रचना सुनाई- कुछ नहीं होना है लालू ने किया किसी और ने किया तो क्या, खाओ पियो।
जॉनी ने कहा आज तो भगवान भी आतंकवादियों के डर से मंदिर छोड़कर होटल में रु के हैं। राम के माहौल के बीच युवा कवयित्री रश्मि किरण ने प्रेम की पींगें डालकर भरी ठंड में प्यार की गर्माहट से श्रोताओं का मन भिगो दिया- लम्हा-लम्हा मापेंगे पैमाना बैठे हैं अपनी-अपनी मस्ती के दीवाने बैठे हैं। गीत पत्थर को सुनाने की जरूरत क्या है दिल में कांटों को लगाने की जरूरत क्या है जिसके हाथों में लकीरें हों गद्दारी की उसको अदब सिखाने की जरूरत क्या है? लाड़सिंह गुर्जर ने रचना सुनाई- कुर्सी पर बैठे हो तो कत्र्तव्य निभाना चाहिए चेहरे पर कोई उदासी होना चाहिए गंदगी संभालकर रखने की चीज नहीं इसे नाली में बहाना चाहिए।
राणा जेबा ने माहौल में प्रेम का अलाव जलाया- उनकी रचनाओं में मीठी सी शैतानी और हलकी चुभन महसूस की श्रोताओं ने- दोस्ती को नवाजा ये दुश्मनी का भरम तोड़ दो मैं भी अपनी कसम तोड़ दूं, तुम भी कसम तोड़ दो। उनकी दूसरी रचना पर श्रोताओं ने तालियां बजाईं- कभी आगाज लिखा है कभी अंजाम लिखा है कभी खुलकर बयां होता, कभी गुमनाम लिखा है। मुझे लगता है मैं हर घड़ी महसूस करती हूं मेरी सूनी हथेली पर तुम्हारा नाम लिखा है। संभालो प्यार से इनको अगर ये छूट जाएंगे खिलौने की तरह गिरकर टूट जाएंगे बहुत मुश्किल से बनते हैं मुहब्बत के यहां रिश्ते हिफाजत कर न पाओगे तो एक दिन टूट जाएंगे। इसके साथ ही राणा की एक और रचना तुम्हारा दिल हमारा है भी लोगों ने खूब पसंद की।
संचालन कर रहे सत्येन वर्मा ने रचना सुनाई- भगवान तुम्हें जमीं खा गई है या आसमान कहां हो मैंने मंदिर, मसजिद और चर्च के पते पर ढेरों पत्र लिखे मगर तुम नहीं दिखे। तुम्हारा पत्र लिए मंदिर गया था वहां नजर आया पुजारी अधूरे दंगे की पूरी तैयारी।
माणिक वर्मा ने 70 साल की उम्र में बीमार होने के बावजूद मंच से शानदार प्रस्तुतियां देकर कवि सम्मेलन की रौनक बढ़ाई। उन्होंने कहा- कान्हा बंसी को न ठुकराए तो मैं गीत लिखूं राधा सड़कों पर न आए तो मैं गीत लिखूं आदमी आदमी बन जाए तो मैं गीत लिखूं। उनकी अगली रचना भी बेहद सराही गई- दुनिया के सबसे उच्च कोटि के नीचों शराब पीते हो, शर्म नहीं आती भूख का नशा क्या कम होता है? जो शराब पीकर मरते हो शराब पीकर संस्कृति को बदनाम करते हो। मरना हो तो भूख से मरो। अपनी संस्कृति का नाम ऊंचा करो। अगर हम पीएं तो बात कुछ और है। सुबह पौने चार बजे कवि सम्मेलन का समापन श्री सत्तन की गंभीर रचना से हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत में आयोजक ललित पोरवाल ने सभी अतिथियों और कवियों का सम्मान किया।