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ख्वाजा के दर भी आता है बसंत

अजमेर. ख्वाजा साहब की दरगाह में करीब आठ सौ साल से वसंत का पर्व मनाया जाता है। दरगाह के शाही कव्वाल अमीर खुसरो के सूफियाना कलामों के बीच वसंत का गुलदस्ता लेकर आस्ताना-ए-आलिया पहुंचते हैं। दरगाह में यह पर्व क्यों मनाया जाता है। इसकी शुरुआत कब हुई। इस बारे में ‘भास्कर’ ने बुजुर्ग शायर सैयद मन्नान राही चिश्ती और शाही कव्वाल असरार हुसैन से बातचीत की।

चिश्ती ने बताया कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के अलावा दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन औलिया, ख्वाजा बख्तियार अहमद काकी, कलियर शरीफ और गुलबर्गा की दरगाह में भी वसंत पेश किया जाता है।

क्यों चढ़ाया जाता है : राही ने बताया एक बार निजामुद्दीन औलिया गुमसुम बैठे थे। उनके शागिर्द अमीर खुसरो ने अपने पीर को राजी करने के लिए कई कविताएं और लतीफे सुनाए, लेकिन वह खुश नहीं हुए। इस दौरान कुछ महिलाएं सिर पर सरसों के फूल लेकर वसंत के गीत गाते हुए गुजरीं। खुसरो ने पूछा यह क्या है। उन्होंने कहा यह वसंत का गुलदस्ता देवताओं के चरणों में अर्पित किया जाएगा। खुसरो ने भी एक गागर सजाई और औलिया के सामने पहुंचे।

वह खुसरो का वेश देखते ही मुस्कुरा दिए। तब अमीर खुसरो ने सारा किस्सा बयान किया। तब से बसंत चढ़ाने का सिलसिला शुरू हुआ।शाही कव्वाल असरार हुसैन ने बताया उनके बुजुर्ग हर साल इस रस्म को पाबंदी से अदा करते थे। करीब 50 साल से वह खुद इस रस्म को अदा कर रहे हैं। निजाम गेट से सरसों का गुलदस्ता सजा कर खुसरो के कलाम पेश करते चलते हैं।

इसके लिए दौराई व ब्यावर रोड से सरसों के फूल लाए जाते हैं। फूलों को तोड़ते वक्त यह ध्यान रखा जाता है कि उसमें कीड़े नहीं लगे हों। दरगाह में चढ़ाए जाने वाले फूल धोए नहीं जाते, कुदरती तौर पर शबनम की बूंदों से ही धुलाई होती है।

दरगाह में बसंत 13 को

दरगाह में 13 को बसंत पेश किया जाएगा। हर साल हिजरी संवत के सफर महीने की पांच तारीख को बसंत पेश किया जाता है। कार्यक्रम सुबह 9.30 बजे से निजामगेट से शुरू होगा।





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