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Chandigarh Chandigarh चंडीगढ़ पंजाब के शहरों के मुकाबले चंडीगढ़ में 50 फीसदी कम पतंग उड़ती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यहां पतंगबाजी का क्रेज घट गया। 35 वर्र्षाे से पतंग बेचने का कार्य कर रहे धर्मवीर जैन का अनुभव तो ये बताता है कि पिछले बीस वर्र्षाे के मुकाबले अब 50 फीसदी ज्यादा पतंग बिकती हैं।
पतंगों की सबसे ज्यादा बिक्री बसंत पंचमी के अलावा जून, जुलाई और अगस्त में होती है। बसंत पंचमी और 15 अगस्त पर तो पतंगबाजी की प्रतियोगिताएं भी होती हैं। जैन ने बताया कि एक जमाना था जब सेक्टर-22 के नेहरू पार्क में पतंगबाजी होती थी, लेकिन अब इसका स्थान लेजर वैली, यूनिवर्सिटी, रॉक गार्डन के सामने और लेक ने ले लिया है।
स्थान ही नहीं अब पतंग के मेटीरियल में भी चेंज आया है। पहले सिर्फ कागज की पतंग हुआ करती थी, लेकिन अब पॉलीथिन की पतंग उसकी जगह लेती जा रही हैं। इसका कारण कागज का महंगा होना और जल्दी फटना है, जबकि पॉलीथिन की पतंग हल्की बूंदा-बांदी में भी सेफ रहती है और पेड़ आदि में उलझकर फटने के चांस भी कम रहते हैं।
यही नहीं चेन्नई से तो कपड़े की पतंग भी आने लगी हैं। लगभग तीन सौ रुपए तक कि ये पतंग हवाई जहाज, चील और उल्लू आदि की शेप में होती हैं, ये तीन फीट से भी ज्यादा बड़ी होती हैं। जैन ने बताया कि चंडीगढ़ में दो से पांच रुपए वाली पतंगों की ज्यादा बिक्री होती है जिन्हें ज्यादातर युवा ही खरीदते हैं।
डोर में चीन भारी पहले लखनऊ और बरेली की डोर (मांझा) से ही पतंग उड़ाई जाती थी, लेकिन अब चीन की बनी डोर भी आने लगी है। रेशम की ये पतली डोर मजबूत होती है और भारी पतंग उड़ाने में काम आती है, लेकिन पेंच लड़ाने वाले लोग देशी मांझे का ही प्रयोग करते हैं।