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छात्रावासों में लगती हैं ‘गरीब थालियां’

बिलासपुर.b न घंटी बजती है और न ही कोई किसी को बताता है कि भोजन का समय हो गया है। भूख से व्याकुल छात्र रसोई का चक्कर काटते रहते हैं। वह समय भी आता है, जब जिले के सैकड़ों छात्रावासों के धूलभरे कमरों में हजारों गरीब थालियां लग जाती हैं और छात्र उन पर टूट पड़ते हैं। ऐसा रोज दिन में दो बार होता है।

छात्रावासों में ऊंट के मुंह में जीरा कहावत एक-दो नहीं,ं बल्कि पिछले कई सालों से चरितार्थ हो रही है। शिष्यवृत्ति व भोजन के नाम पर मिलने वाली राशि इतनी कम है कि इससे पौष्टिक आहार तो दूर, पेटभर भोजन भी नहीं मिल सकता। आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा संचालित जिले सहित पूरे प्रदेश के छात्रावासों में खासतौर पर गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवार के बच्चे रहते हैं। उज्जवल भविष्य की कामना लिए छात्र-छात्राएं अपने गरीब मां-बाप व घर को छोड़कर शासन द्वारा दी गई छात्रावास व्यवस्था को पूरे मन से अपनाते हैं, लेकिन बदले में उन्हें फिर से मिलता है गरीब छात्रवास और गरीब साथी।

जिले में 20 पोस्ट मेट्रिक,110 प्री मेैट्रिक व 39 आश्रम सहित कुल 167 छात्रावास हैं, जहां 7300 से अधिक छात्र-छात्राएं रहते हैं। छात्रावासों में से अधिकांश प्री मेट्रिक हैं, जहां 6 वीं से लेकर 10 वीं कक्षा तक के छात्र निवास करते हैं। इनकी संख्या लगभग 5 हजार से भी अधिक हैं। बालक छात्रावासों को प्रतिमाह शिष्यवृत्ति के नाम पर प्रति छात्र के हिसाब से 350 रुपए मिलते हैं, जबकि बालिका छात्रावासों को दस रुपए ज्यादा यानी 360 रुपए मिलते हैं।

इस राशि से ही छात्र-छात्राओं को भोजन, साबुन, टूथपेस्ट, घर आने-जाने का किराया सहित अन्य खर्च के लिए रुपए दिए जाने रहते हैं, लेकिन सुरसा के मुंह की तरह बढ़ चुकी महंगाई में क्या ये राशि पर्याप्त है। अपर्याप्त राशि के सहारे छात्र किसी तरह जीवन काट रहे हैं, लेकिन वे अपनी तकलीफ बताए भी तो किसे? उनकी फरियाद सुनने वाला कोई नहीं। छात्रावास अधीक्षक भी शासन की इस कंजूसी व लापरवाही से परेशान है। एक अधीक्षक का तो यहां तक कहना है कि अगर अपने परिवार की चिंता नहीं होती तो वे खुद नौकरी छोड़ देते, लेकिन छात्रों को इस तरह अभावों में जीवन काटते नहीं देखते। बच्चे नटखट हैं, कभी-कभी थोड़ा-बहुत परेशान भी करते हैं, लेकिन उन्हें भरपेट भोजन तो मिलना ही चाहिए।





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