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रिस्तो को इल्जाम न दो

वैलेंटाइन डे विशेष. राज कपूर और नर्गिस जब मिले होंगे, तो हमेशा यही सोचते होंगे कि व़क्त ने हमें बहुत देर से मिलाया। ऐसा इसलिए कि राज की तब तक शादी हो चुकी थी और नरगिस कुआंरी थीं। दोनों में हमेशा एक बात को लेकर पछतावा रहता होगा कि काश, राज रुक सके होते नरगिस के लिए। उनमें छोटी-छोटी बातों को लेकर तक़रार होती होगी और दोनों यही कहते होंगे एक-दूसरे से कि देर से मिले हैं, तो कम से कम लड़कर व़क्त Êाया तो न करें।

जितनी भी देर साथ गुÊारते होंगे, एक-दूसरे को यह यक़ीन दिलाने की कोशिश में लगे रहते होंगे कि हमें व़क्त ने मिलाया है, क्योंकि हम बने ही एक-दूसरे के लिए हैं। यक़ीन त्वचा की तरह होता है। जब तक हवा चलती है, मÊाबूत बना रहता है। जब नश्तर चलते हैं, तो फांकों में चाक हो जाता है। यक़ीन, मज़बूत इतना कि गर्मी-सर्दी-बरसात, सब सह ले और नाÊाुक इतना कि ख़ारों से काग़Êा की मानिंद फट जाए। जब दोनांे दूर हो गए होंगे, तो अपने ही यक़ीन को कितना बदयक़ीनी के साथ देखते होंगे।

दिलीप कुमार-मधुबाला, राज कपूर-नरगिस, देव आनंद-सुरैया, अमिताभ बच्चन-रेखा, गुरुदत्त-वहीदा, सलमान-ऐश्वर्या, ऐसी कितनी ही जोड़ियां, जो टूट गईं, लेकिन जिनके टूटने ने उनके होने को अमर कर दिया। टूटी हुई, बिखरी हुई जोड़ियों को लोग असफल प्यार का नाम देते हैं। समझ में नहीं आता कि प्यार कैसे असफल हो सकता है। प्यार को क्यों सफलता-असफलता की दुनियावी बातों से जोड़ दिया जाता है। प्यार कोई सौ मीटर की दौड़ नहीं, जिसके आख़िरी सिरे पर कामयाबी का तमग़ा मिलता है। कोई टी-20 का मैच नहीं कि छह गेंदों पर चालीस रन बनाने हों। प्यार कभी असफल नहीं होता। वह तो साथ बिताए गए हर लम्हे में हरी कोंपल की तरह बढ़ता है। वह तो दूरी में पनपता है और नÊादीकी से फैलता है। उसे असफल कहने वाले लोग हक़ीक़तन हमारे समय के सबसे प्रेम-विरोधी लोग हैं, जो प्यार को एंत्राप्रिन्यर्स की तरह मापते हैं।

जिनका मानना है कि जीवन-भर का साथ न हो या शादी न हो पाए, तो प्यार असफल हो जाता है। प्यार जीवन-भर किसी बंधन के Êारिए साथ रहने का नाम नहीं है। जहां बंधन आ जाता है, वहां सबसे पहले प्यार ही कम होता है। उसे खोल दो, उन्मुक्त कर दो, वह आसमान में नीली फ़सल बनकर लहलहाएगा। बांध दोगे, तो उसकी कसमसाहट आपके दिल को डुबाने लगेगी। प्यार की मुट्ठी जितनी खुली हो, उतनी लाख की। उसकी बंद मुट्ठी ख़ाक की। प्यार करने वालों की दुनिया में कहावतें उल्टी ही असरदार होती हैं।

अगर प्यार है, तो माचिस की डिबिया में सूरज की रोशनी के चकत्ते को भर लेंगे आप और ताÊिांदगी किसी ख़Êाने की तरह संभाल कर रखेंगे। प्यार है, तो कभी उस डिबिया को दुबारा खोलकर देखने की कोशिश नहीं करेंगे। अगर आपको शक होगा कि रोशनी का चकत्ता डिबिया में कैसे क़ैद हो सकता है और आप डिबिया को खोल देंगे, तो यह प्यार के ख़िलाफ़, उम्मीद, सपने और विश्वास के ख़िलाफ़ सबसे फूहड़ क़दम होगा। अपने ही ऊपर बेयक़ीनी का जुर्म होगा यह। उससे Êयादा प्यार के कोमल चकत्तों को अपनी आंखों के सामने अदृश्य होते देखने का नेत्रध्वंसक पाप। हमारी लोक-कथाओं के किरदार लैला-मजनूं, हीर-रांझा की तरह इनका प्यार भी माचिस की डिबिया में बंद रोशनी के चकत्ते की तरह है।

प्यार पाने की नहीं, देने की चीÊा होती है। हममें से कई प्यार पाना चाहते हैं। उस व़क्त हम तर्क करते हैं कि हम कितना प्यार देते हैं। अगर हम सच में प्यार देते हैं, तो देने में ही हम इतने आह्लादित हो जाएंगे, कि पाने का इंतÊार तक नहीं करेंगे। हम सिर्फ़ प्यार देते रहेंगे, देते रहेंगे, एकबारगी यह शुबहा नहीं होगा भीतर कि वापस क्या मिल रहा है। मीरा तो प्यार ही देती थी, कृष्ण तो कभी दर्शन तक नहीं देने आए थे उसे। सस्सी जब सिंध के तपते रेगिस्तान में नंगे पैर दौड़ी थी, तो प्यार देने के लिए दौड़ी थी। गले तक भरी चिनाब में जब सोहणी कूदी थी, तो वह परले किनारे प्यार पाने के लिए नहीं जा रही थी, वह महिवाल को वादे का प्यार देने जा रही थी।

अनारकली जब Êिाल्ले-इलाही के आगे नाच रही थी, तो उस व़क्त उसकी रगों में जो बह रहा था, उसका असली नाम ख़ून नहीं, आंसू है। प्यार ऐसी शै है, जिसे देना, पाने-सा सुख देता है। पाने से भी Êयादा। प्यार तो मुट्ठी में पड़ा रंग है। हवा में उछाल दो। न नÊार आने वाली हवा भी रंगीन नÊार आएगी और कणों-कणों में आपके पूरे वजूद पर गिरेगी। बुहार लो। सहेज लो। रंग दो। रंग दो।

हम किसी के साथ अच्छा करते हैं या बुरा, कोई नहीं जानता। अच्छा और बुरा- हमारी स्थिति पर निर्भर है। यह सापेक्ष है। उत्तर ध्रुव पर खड़े होकर देखो, तो वही चीÊा अच्छी दिखेगी और दक्षिण से वही ख़राब। प्यार को कहीं से भी देखो, प्यार ही दिखेगा।

हम सबके जीवन में एक ख़ाली मैदान होता है, जिस पर दूर तक स्मृतियों की पीली पत्तियां आमंत्रण में बिछी होती हैं, जहां किसी ने हमसे मिलने का वादा किया होता है। जिस मैदान पर सलीम अपनी फ़ौज लेकर चलता है या क़ैस जिस्म को Êार्रा-Êार्रा रेत में बदल रहा होता है। हम उस मैदान में देर से पहुंचते हैं या वह अपना वादा नहीं निभा पाता, कह नहीं सकते। पर उस मैदान में एक न दिन Êारूर मिलना होता है, जहां साहिबे आलम के इंतÊार में कोई कली मुरझा रही होगी। हम देख पाएं या नहीं, पर वहां किसी पत्थर पर प्यार की काली शॉल ओढ़े कोई आकृति Êारूर चुपचाप, दुनिया-जहान की सारी चोटों को होंठों पर चस्पा किए, बैठी होती है। ग़ौर से देखिएगा अगली बार, वह आकृति महÊा ढाई अक्षरों से बनी होगी।

अगर पूरे जीवन में आपने किसी से लम्हा-भर के लिए भी शिद्दत से प्यार किया हो, Êिांदगी की धुन को बदलकर देखा हो, किसी के हाल से अपना हाल मिल जाने की तमन्ना से दिल को बहला लिया हो, तो आज के दिन अपनी पसंदीदा किताब के किसी पन्ने में गुलाब की एक पंखुड़ी संभालकर रख देना। बाक़सम, इस पंखुड़ी की सुगंध दुनिया के तमाम प्यार करने वालों को दर्द, तकलीफ़ और तड़प को सहने की बेइंतहा ताक़त देगी।





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