नई दिल्ली
चुनाव आयोग के इतिहास में संभवत: पहली बार मतभेद इतने खुलकर सामने आए हैं कि उसे एक मामले में नोटिस भेजने का फैसला मत-विभाजन के आधार पर लेना पड़ा है। यह मामला कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को संसद की सदस्यता से अयोग्य ठहराने की याचिका से संबंधित है। अंतत: आयोग ने 2:1 से सोनिया को नोटिस भेजने का फैसला किया है।
क्या है मामला
चुनाव आयोग में एक याचिका दायर कर बेल्जियम का दूसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ऑर्डर ऑफ लिओपॉल्ड स्वीकारने के लिए श्रीमती गांधी को संसद की सदस्यता से अयोग्य ठहराने का आग्रह किया गया है। इस पुरस्कार में एक कथित प्रावधान यह भी है कि प्राप्तकर्ता को इस यूरोपीय देश के संविधान के प्रति निष्ठावान होना चाहिए। सोनिया को यह पुरस्कार नवंबर 2006 में उनकी बेल्जियम यात्रा के दौरान दिया गया था।
जबरदस्त कवायद
आयोग के लिए यह निर्णय करना आसान नहीं था। यूपीए अध्यक्ष को नोटिस जारी करने का निर्णय करने से पहले उसे कई बैठकें करनी पड़ीं और ढेर सारी फाइलें निपटानी पड़ीं। यही नहीं, उसने इस मामले में विधि विभाग और विशेषज्ञों से भी राय ली। दिलचस्प बात यह है कि यह मतभेद कागजों में भी औपचारिक रूप से दर्ज हो गया है। एक अधिकारी ने बताया कि आयोग ने अब तमाम कागजी औपचारिकताएं पूरी कर ली हैं। संभवत: सोनिया को वीरवार को नोटिस भेज दिया जाएगा।
यों नजर आई फूट
आयोग में 2:1 की सीधी फूट केवल उन्हें नोटिस भेजने के मामले में ही देखने को नहीं आई, बल्कि एक और संबद्ध मुद्दे पर भी दिखी। दूसरी फूट इस मामले में विदेश मंत्रालय की राय लेने के बारे में थी।
पक्ष-विपक्षएन गोपाल स्वामी (मुख्य चुनाव आयुक्त) :
नोटिस भेजकर सोनिया से जवाब-तलब किया जाए।
नवीन चावला (चुनाव आयुक्त) :
नोटिस भेजा जाए।
एसवाई कुरैशी (चुनाव आयुक्त) :
अभी इंतजार करें। पहले खुद याचिकाकर्ता को इस बात के और ठोस सबूत पेश करने को कहा जाए कि अवार्ड को स्वीकारने का मतलब उस देश के संविधान के प्रति निष्ठा जताना है।