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पूरे तंत्र को झंझोड़ डालने का वक्त

विशेष संपादकीय. दूषित पानी पर अब आंसू बहाना बंद करना होगा। इस दौरान हमने सात अनमोल जिंदगियां गंवा दीं - लेकिन उन्हीं इलाकों में फिर नलों से जहर बहने लगा। रुकना था ही नहीं - क्योंकि लाइनें तो वही थीं - उम्र से जर्जर, भ्रष्टाचार से सनी हुई, अवैध तरीकों से मंजूर निर्माण कार्र्यो से दबी हुई। सरकार और उसके विभिन्न विभाग, मंत्री और अफसर - अब इन्हें कोसने मात्र से कुछ नहीं होगा। क्योंकि इनमें से अनेक ऐसे हैं, जो इन मौतों के सीधे जिम्मेदार हैं।

कौन हैं ये दूषित पानी के दोषी? इनके नाम सामने लाने होंगे। इनके चेहरे कितने सुदर्शन हैं - सारे जहां को दिखाना होगा। इनकी मानसिकता कितनी विकृत है - यह पता लगाना होगा। कितने रुपयों में किस अफसर ने अपनी नैतिकता बेची और विष को पेयजल से मिलने देने का अंतर कम कर दिया या होने दिया? यह अंदाजा लगाना होगा।

कैसे खोजें दूषित पानी के दोषी?
सबसे पहले ‘व्यवस्था’ यानी ‘सिस्टम’ की आलोचना बंद करनी होगी। क्योंकि व्यवस्था को कोसना काले कंबल पर रंग चढ़ाने जैसा होता है। व्यवस्थापकों पर आक्रमण करना होगा। अभी किसी का नाम सामने न आने से हर दोषी निर्दोष बना हुआ है। नाम पता लगाने के लिए समूचे तंत्र को झंझोड़ना होगा।

जैसे मुरलीपुरा में पानी और ड्रेनेज लाइन किसने, किन अफसरों की सहमति से डाली, उसका आकार जनसंख्या के 10 साल बाद होने वाले दबाव को ही देखते हुए तय किया या 50 वर्ष के हिसाब से योजना बनाई थी? किसे ठेके दिए गए? तयशुदा दूरी पर लाइनें डलेंगी, इसकी निगरानी किस-किस के जिम्मे दी गई? और वहां निर्माण उस आबादी के अनुरूप हो रहे हैं या नहीं - इसे देखने वाला कौन था?

स्वास्थ्य, स्वच्छता और पर्यावरण के मानदंडों का पालन किन-किन अफसरों को करवाना था। यानी हरेक बात की स्वीकृति और हर स्वीकृति की निगरानी वालों के नाम सामने लाए जा सकते हैं। बस - इनमें से जो भी कमी जहां भी पाई जा रही है - वहीं दूषित नीयत है, दूषित कृत्य, दूषित मंत्री-अफसर हैं - इसीलिए दूषित पानी है।

काली कमाई का पता कैसे लगाएं?
बेईमानी से हासिल संपत्ति सबसे बड़ा छलावा है। इसी तरह इसके रंग हैं। ढूंढ़ने जाओ तो इतनी काली कि नजर ही नहीं आती। चरित्र से कमजोर लोगों के लिए इतनी चमकीली कि आंखें चुंधिया जाएं। यानी पहचान घोषित करने के बाद भी दूषित पानी के दोषियों का भ्रष्टाचार विधिवत कैसे सिद्ध किया जाए?

यह दुरूह तो है, किंतु कल्पना ही की जा सकती है कि अचानक, एक ही दिन, केंद्र और राज्य की कई भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियां यदि एक साथ राज्य के जलदाय विभाग, जयपुर विकास प्राधिकरण, जयपुर नगर निगम और सभी कामों में बढ़चढ़कर शामिल हुए ठेकेदारों के चमकते बंगलों व दमकते प्रतिष्ठानों पर छापे मारें तो क्या मिलेगा? न जाने क्या-क्या मिलेगा? अवैध धन-संपदा के साथ ऐसा काफी कुछ, जो सिद्ध कर देगा कि कोई भी व्यवस्था - पानी की तरह - दूषित कैसे की जा सकती है।

ऐसे दोषियों को दंड क्या मिले?
सरकारी जांच तो जीवाश्म की तरह अनंत है। अपने लाभ-शुभ के लिए गरीब परिवारों के कलेजे चीर देने वालों में निश्चित ही आसुरिक उद्दंडता छिपी बैठी होगी। इनके लिए तो भ्रष्टाचार निवारण कानून की धाराएं तो धारावाहिकों की तरह हैं - जिन्हें वे अपने मनोरंजन के लिए, अपनी सुविधा से पढ़ेंगे। समाज के ऐसे अपराधियों पर तो गैर इरादतन हत्या के मुकदमे चलाए जाने चाहिए।

तत्काल क्या करें?
सरकारी कुर्सियों की ताकत से इस तरह के दोषियों पर जब तक कानूनी कार्रवाई हो, उससे पहले जनसुनवाई होनी चाहिए। किंतु सबसे पहले आवश्यक है, जड़ पर प्रहार। यानी पाइपलाइनों को तत्काल बदलना। हम जयपुरवासियों को बड़ा कदम उठाना होगा।

हमें ऐसे सभी प्रोजेक्ट्स जो शायद हमारे विकास का आधार बनने जा रहे हों - रोक देने चाहिए। हमें अभी स्पोट्र्स सिटी नहीं चाहिए - क्योंकि पीने का पानी साफ नहीं होगा, तो खेलेंगे क्या? अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर बाद में बना लेंगे - क्योंकि विषाक्त पानी पीकर कौनसे समारोह में जाएंगे?

हमें फिलहाल न शूटिंग रेंज की जरूरत है, न फिल्मसिटी चाहिए और डॉल्फिन पार्क तो मुंह चिढ़ाता ही नजर आ रहा है। सेंट्रल स्पाइन प्रोजेक्ट तो तब काम का हो, जब हम अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रख सकें। और इन सबसे पहले जरूरी है नई पाइपलाइनें। सारे खर्चे रोक दीजिए। कोई चार-पांच सौ करोड़ रु. में तो सारा शहर सुरक्षित, स्वच्छ, स्वस्थ और सुगठित हो सकता है। सरकार के लिए कुछ हजार करोड़ के क्या मायने?





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