जोधपुर. मास्को की रसियन एकेडमी ऑफ साइंस इन्स्टीट्यूट ऑफ ईथनोलॉजी एंड एंथ्रोपोलौजी में सीनियर रिसर्च फेलो डॉ. स्वेतलाना आई रिझाकोवा भारतीय नृत्य कला की दीवानी है। वह गत 12 वर्ष से बार-बार भारत में विभिन्न नृत्य कलाओं सहित प्रदर्शनात्मक कलाओं को सीखने व उनकी जानकारी लेने आती रहती है।
जोधपुर में बुधवार को राजस्थान संगीत नाटक अकादमी स्थित लोक कला संग्रहणालय देखने पहुंची स्वेतलाना ने भास्कर को बताया कि वे भारतीय नृत्य कलाओं सहित राजस्थान के लोक संगीत के प्रति भावनात्मक लगाव रखती हैं। यहां तक कि वर्ष 1996 में उन्होंने कथक गुरु राजेंद्र गंगाणी को अपना गुरु बनाया व नृत्य सीखना शुरू किया।
नृत्य कलाओं पर पुस्तक लिखी
स्वेतलाना ने अब तक रूस में भारतीय नृत्य कलाओं के बारे में पुस्तक भी प्रकाशित की है। इसका टाइटल है ‘इंडियन डांसेज’-आर्ट ट्रॉसफोरमेशन। स्वेतलाना ने बताया कि वे इस पुस्तक का दूसरा संकलन जारी करने के प्रयास में एक बार फिर भारत आई हैं। जोधपुर में पहली बार आई स्वेतलाना अब तक नागौर, मेड़ता, बोरानाडा सहित अन्य गांवों में कलाकार जातियों से संपर्क कर उनकी कलाओं की जानकारी प्राप्त की।
रिकर्ॉ्िडग कंपनी से जुड़ाव है
स्वेतलाना ने कहा कि वह राजस्थान की विभिन्न लोक कलाओं की रिकर्ॉ्िडग कर रहे एक प्रॉडक्शन ग्रुप से हाल ही में जुड़ी हैं । वह लंगा-मांगणियार सहित दमामी, ढोली, भाट आदि कलाकार जातियों से जानकारी जुटाने का प्रयास कर रही हैं।
साथ ही स्वेतलाना ने पश्चिमी राजस्थान में परंपरागत रूप से गाए जाने वाली मांड केशरिया बालम के बारे में भी रुचि प्रकट करते हुए मारवाड़, बीकानेर व उदयपुर के गायकों की जानकारी भी संग्रहीत की है। स्वेतलाना करीब 5 दिनों तक जोधपुर में रहेंगी तथा रिसर्च कार्य सहित विभिन्न कला कार्यक्रमों में शिरकत करेंगी।