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संगीत में रम जाएं, सब समझ आ जाएगा : शिवकुमार

उदयपुर. कश्मीर की वादियों के साज संतूर को विश्व ख्याति दिलाने वाले पंडित शिवकुमार शर्मा का मानना है कि शास्त्रीय संगीत का आनंद लेने के लिए इसकी समझ का होना जरूरी नहीं। यह केवल भ्रांति है कि जिसे जानकारी है वही इस संगीत का आनंद ले सकता है। शास्त्रीय संगीत सुनें, उसके लिए कंसंट्रेट हों, उसमें रमें, मजा आएगा। विश्लेषण करेंगे तब मामला बोझिल हो सकता है।

तबला नवाज पंडित चतुरलाल की स्मृति में होने वाले ‘स्मृतियां’ में आए शिवकुमार शर्मा बुधवार दोपहर पत्रकारों से बतिया रहे थे। उन्होंने कहा कि रागें वे ही हैं, सुर वे ही हैं। नयापन डिपेंड करता है आर्टिस्ट के मूड, वातावरण व सुनने वालों पर। हम दुबारा तो कोशिश करके भी नहीं बजा सकते। हर बार कुछ नया ही निकलेगा।

हम संगीत चलाते हैं
भारत रत्न के बारे में संगीतकारों की ओर से कोई नाम नहीं चलाने के बारे में पंडित शिवकुमार शर्मा का कहना था कि नाम चलाना संगीतज्ञों का काम नहीं। हम तो केवल संगीत चलाते हैं।

कापरेरेट कला के संरक्षक बनें
पंडित शर्मा ने व्यावसायिक घरानों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों से अपील की कि वे यहां के संसाधनों से कमाते हैं तो यहां की संस्कृति को कुछ दें भी। कलाएं, ज्योतिष, खेल पहले राज्याश्रय में पनपते थे। सरकारें सब काम नहीं कर सकती। केवल पुरस्कार, सम्मान भर से कलाकार का जीवन नहीं चलता।

पंडित शर्मा ने कहा कि उन्हें कला को चेहरे नहीं शख्स दिए हैं। नंदकिशोर मूलेट, अजिंदरपालसिंह, किरणपालसिंह विदेशों में नाम कमा रहे हैं। सतीश व्यास, धनंजय, विविध काले भारत में ही काम कर रहे हैं। राहुल शर्मा को दुनियाभर के श्रोताओं से दाद मिल रही है। श्रुति कठाले, जापान की पोमोरो, सपना चक्रवर्ती भी इस साज में रम चुकी हैं।

‘प्रार्थना’ में पंचदेव आराधना
पंडित शर्मा ने बताया कि ‘प्रार्थना’ सीरिज में गणपति, राम, सूर्य, सरस्वती व गायत्री की स्तुति की जाएगी। इनकी स्तुतियों को कम्पोज किया जा रहा है। उनका कहना था कि फिल्म में संगीत देने के लिए समय नहीं निकल पाता। हरिप्रसाद चौरसिया भी काफी व्यस्त हैं। पहले निर्माता-निर्देशकों का इतना सहयोग था कि जब हमें समय मिलता वे रिकर्ा्िडग करवा लेते थे। अब वक्त बदल चुका है।

पहले तबला बजाते थे
संतूर के पर्याय बन चुके पंडित शिवकुमार शर्मा ने 1950 की याद ताजा करते हुए कहा कि वे पंडित चतुरलाल से बतौर तबला वादक ही मिले थे। हमें दिल्ली रेडियो में साथ काम करने का मौका भी मिला। संगत क्या होती है? यह चतुरलालजी से ही सीखा। मैं गाता भी था लेकिन सोच लिया कि संतूर में ही काम करना है तब इन्हें छोड़ना पड़ा।

अच्छी चीज बनी रहेगी : जाकिर
तबला नवाज उस्ताद जाकिर हुसैन का मानना है कि हर आर्ट को चांस मिलना चाहिए। इन दिनों ड्रमर्स के अलावा जॉज, पॉप कलाकारों के साथ प्रोग्राम करने वाले, कई एलबम बना चुके उस्ताद का कहना है कि फ्यूजन नया ट्रेंड है। इसमें बुरा क्या है? कुछ सालों में पता चला जाएगा, क्या बना रहता है। अच्छी चीज है तो बनी रहेगी। यही कारण कि शास्त्री संगीत का वजूद कायम है। यह हर संगीत की बुनियाद है।

लाइब्रेरी आफ कांग्रेस में पंडित चतुरलाल
जाकिर हुसैन ने बताया कि पंडित चतुरलाल ही वे शख्स थे जिन्होंने पहली मर्तबा तबले को देश के बहार बजाया। 1955 में वे अली अकबर खान के साथ वाशिंगटन में गई थे। तब कि रिकर्ा्िडग वाशिंगटन की लाइब्रेरी आफ कांग्रेस में सुरक्षित है।

16 एमएम की फिल्म भी है जिसमें वे जॉज म्यूजिशियन व ड्रमर के साथ प्ले कर रहे हैं। अक्टूबर में मुझे वहां वह रिकर्ा्िडग देखने का मौका मिला। रिकर्ा्िडग की कॉपी करवानी चाही लेकिन वहां के नियमों के कारण यह हो नहीं सकी।

टाल गए उस्ताद
पत्नी एंटोनिया मिनेकोला (न्यूयार्क) भी उस्ताद के साथ उदयपुर र्आई। कुछ महीने पहले ही उदयपुर आए उस्ताद से पूछा गया कि यहां कि किस खासियत ने उन्हें इतना लुभाया कि इस बार ‘भाभी’ को भी साथ ले आए। जोर का ठहाका लगाते हुए उस्ताद इस सवाल का बड़ी खूबसूरती से टाल गए। उन्होंने इतना जरूर कहा कि दिन में शहर घूमेंगे।





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