अजमेर.
निजी जायदाद को यूआइटी की संपत्ति बताने वाले अफसरों को अदालत ने कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा, यूआइटी बदनीयत है और उसने अदालत का समय बर्बाद किया है। यूआइटी पर नौ हजार रुपए कॉस्ट आयद करते हुए यूआइटी सदर और स्थानीय निकाय महकमे को उत्तरदायित्व तय कर राशि वसूलने और राजकोष में जमा कराने के आदेश दिए गए हैं।
मुंसिफ नॉर्थ बीके गोयल की अदालत में एलआइसी कॉलोनी, वैशाली नगर निवासी डॉ. आरके मेहता और उनकी पत्नी अनुपमा मेहता तथा रामगंज निवासी सतीश यादव ने तीन वाद दायर किए थे। मेहता दंपती ने यूआइटी सचिव और सतीश यादव ने राज्य सरकार, तहसीलदार, यूआइटी और नगर परिषद को पार्टी बनाया था।
यूआइटी की ओर से मेहता दंपती के प्रकरण में तत्कालीन विशेषाधिकारी अनुराग भार्गव ने और सतीश यादव के प्रकरण में ओआइसी सहायक अभियंता टीआर खुड़ीवाल ने जवाब पेश कर दावा किया था कि संपत्ति यूआइटी के योजना क्षेत्र में है, जिसका अधिग्रहण 1990 में किया जा चुका है। सुनवाई के दौरान बयान देने दोनों अफसर नहीं आए और उनके स्थान पर पटवारी टोडरमल को भेजा गया।
टोडरमल ने बयानों में स्वीकार किया कि तीनों पक्षों की संपत्तियां यूआइटी प्रशासन 20 जनवरी 1990 को ही अधिग्रहण से बाहर कर चुका है। मेहता दंपती और सतीश यादव के वकीलों ने साबित किया कि जिस संपत्ति पर यूआइटी अपना हक जता रही है वो निजी है।
घोर लापरवाही..
अदालत ने फैसले में यूआइटी के खिलाफ टिप्पणी की कि यह घोर लापरवाही है। अदालत को गुमराह कर वस्तु स्थिति स्पष्ट नहीं की गई। अफसरों ने उत्तरदायित्व का पालन नहीं किया। जब यह साफ हो गया है कि संपत्ति यूआइटी की नहीं है तो भी अफसरों और कर्मचारियों ने अदालत को गुमराह किया। साफ है कि संपत्ति के प्रति यूआइटी की नीयत ठीक नहीं है।
मामला, एक नजर
मामला खसरा नंबर 2157 के भूखंड का है। यहां मेहता दंपती का निर्माण 119/1 और सतीश यादव की चार दुकानें हैं। तीन साल पहले यूआइटी के अफसर भूखंड को अपना बताकर निर्माण तोड़ने पहुंच गए। मेहता दंपती और सतीश यादव ने अदालत की शरण ली।
अफसर पहुंचे ही नहीं
दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद अफसरों को पता चल गया कि संपत्ति यूआइटी की नहीं है, इसलिए तत्कालीन विशेष अधिकारी अनुराग भार्गव और एइएन खुड़ीवाल बयान देने नहीं पहुंचे। अदालत ने इस पर भी टिप्पणी की कि दोनों अफसरों ने बयान देने नहीं आने का कारण साफ नहीं किया।