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कहां है पुलिस

भोपाल.
crime 16 दिन 15 लूट
राजधानी पुलिस के आला अफसरों द्वारा कानून-व्यवस्था की स्थिति पर चिंता जताने और अपराधियों से निपटने के लिए दिए जा रहे टिप्स के बीच शनिवार को एक और महिला दिन दहाड़े लूट की शिकार हो गई। बीते 16 दिनों में राजधानी में लूट की यह 15वीं वारदात है।

यह घटना सावंतिका पेट्रोल पंप के सामने हुई। गोविंदपुरा पुलिस के अनुसार पुलबोगदा के पास अशोकनगर में रहने वाले विनोद पांडे ग्रेसिम इंडस्ट्री में मार्केटिंग आफीसर हैं। उनकी पत्नी संध्या सुबह करीब 11 बजे बेटी के स्कूल से लौट रहीं थी। बेटी तान्या कार्मल कांवेंट में फस्र्ट क्लास में पढ़ती है।

जब वे सावंतिका पेट्रोल पंप के सामने थीं, तभी पीछे से आए एक बाइक सवार ने उनके गले से चार तोला वजनी सोने की चेन झपट ली। जिसकी कीमत करीब 45 हजार रुपए बताई गई है। इसके बाद श्रीमती पांडे ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी स्कूटर से बाइक सवार का पीछा किया।

वे उसका पीछा करते हुए सुभाष नगर विश्राम घाट तक र्आई। यहां उन्होंने स्कूटर से बाइक को टक्कर मारी। इस टक्कर में लुटेरा गिरा, लेकिन श्रीमती पांडे व उनकी बेटी तान्या भी गिर र्गई। तान्या को भी चोट आई और श्रीमती पांडे उसे संभालने के चक्कर में लुटेरे को नहीं पकड़ सकीं। लुटेरा उठकर भाग निकला।

ऐसे थे लोग और पुलिस वाले
जिस जगह लुटेरा गिरा वहां काफी भीड़ रहती है, पर आम लोगों ने उसे पकड़ने की हिम्मत नहीं जुटाई। श्रीमती पांडे पहले ऐशबाग थाने पहुंचीं वहां से उन्हें गोविंदपुरा थाने भेज दिया गया।

इस मामले में हमेशा की तरह पुलिस ने अज्ञात आरोपी के खिलाफ लूट का प्रकरण दर्ज किया है। सुबह करीब 11 बजे हुई इस वारदात की रिपोर्ट शाम को दर्ज हो सकी क्योंकि पुलिस थानों के सीमा विवाद में उलझी थी। जब यह घटना हुई तो पूरे शहर की पुलिस प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की रैली की व्यवस्था में लगी थी।

राजधानी में औसतन हर दिन लूट की वारदात हो रही है। फरवरी माह के 16 दिनों में शनिवार की सुबह लूट की 15 वीं वारदात हुई। इन 15 वारदातों में से सिर्फ एक का आरोपी पकड़ाया जिसे जनता ने पकड़कर पुलिस के हवाले किया था। इसमें भी गोविंदपुरा में एक रिटायर्ड कंपनी कमांडर की पत्नी के साथ हुई लूट को तो पुलिस ने दर्ज ही नहीं किया था, क्योंकि उनकी पत्नी का हार आर्टीफीशियल था।

आधी रात तक खुली रहती हैं दुकानें
शहर में कुछ इलाकों में दुकानें आधी रात तक खुली रहती हैं। अधिकांश दुकानों पर असामाजिक तत्वों का जमघट रहता है। सड़क घेर कर खड़े होने वाले ऐसे तत्वों पर पुलिस कार्रवाई करने से झिझकती है।

मुखबिर तंत्र नहीं, कमाई पर ध्यान
पुलिस का मुखबिर तंत्र न के बराबर है। पुलिस के अधिकांश मुखबिर दलाली के काम में लगे हैं। पुलिस गुंडे-बदमाशों से ज्यादा ध्यान ऐसे कामों पर लगाती है जो उसे आर्थिक फायदे पहुंचाएं। सिपाहियों की तैनाती टीआई और सीएसपी की पसंद से हो रही है, लेकिन नतीजे सिफर हैं।

>> हमने अधिकांश लुटेरों का सुराग लगा लिया है। एक-दो दिन में उन्हें पकड़ कर मामलों का खुलासा कर दिया जाएगा।
डा. शैलेंद्र श्रीवास्तव, आईजी भोपाल

>> पुलिस अपना काम कर रही है। जल्दी ही नतीजे सामने आ जाएंगे।
जयदीप प्रसाद, एसपी, भोपाल

उठने लगा जनता का भरोसा
राजधानी के ऐसे हालात शायद कभी भी नहीं थे। यहां बेखौफ लुटेरों का आतंक बरकरार है, शहरी सहमे हुए हैं और पुलिस प्रकरण दर्ज करने से ज्यादा कुछ भी नहीं कर पा रही है। ऐसा तब हो रहा है जबकि पुलिस के आला अफसर बैठकों की शक्ल में कानून-व्यवस्था पर आए दिन चिंता जताते हैं।

कंट्रोल रूम में रोजाना बैठक हो रही है। इस सारी मशक्कत के बीच सच यह है कि अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं। पीड़ित आम जनता का मानना है कि पुलिस का सारा ध्यान चेकिंग और वसूली तक सीमित है।

क्या कहती हैं लूट की शिकार
>> पुलिस लुटेरों के खिलाफ कुछ नहीं करती। वे सरे राह महिलाओं को निशाना बना रहे हैं। महिलाओं का घर से निकलना मुश्किल हो गया है।
छाया दीक्षित. शाहपुरा

>> पुलिस तो लुटेरों के खिलाफ कुछ कर नहीं रही। अब लोगों को मीडिया से ही उम्मीद है। घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। पुलिस चौराहों पर तमाशबीन बनके खड़ी रहती है।
संध्या पांडे. अशोक नगर

90 फीसदी को भरोसा नहीं पुलिस पर
भास्कर ने बढ़ते अपराधों पर शहर के चुनिंदा 50 लोगों से बात की, जिनमें से करीब 95 फीसदी स्थिति पर पुलिस के रवैये से नाखुश नजर आए। हालांकि कुछ पुलिस की परेशानियों की बात भी करते हैं, लेकिन अधिकांश का कहना है शहर मे कानून-व्यवस्था का राज खत्म हो चुका है।

यह भी कहते हैं शहरी
>> पुलिस की अपनी परेशानियां और धर्मसंकट है। आम आदमी नियम-कानून का कोई सम्मान नहीं करता। लोगों को कानून तोड़ने में गर्व महसूस होता है। ऐसे में जब तक लोगों में कानून के लिए सम्मान नहीं आएगा, तब तक ऐसा ही समाज मिलेगा, जैसा मिल रहा है। बिना खुद को सुधारे इससे बेहतर समाज की कल्पना और महत्वाकांक्षा करना भला कैसे उचित कहा जा सकता है?
राव कुलदीप सिंह यादव, निवासी, सुरेंद्र पैलेस, भोपाल

>> पुलिस की भूमिका को संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। अपराधी खुले आम घूमते हैं और पुलिस वाले मजबूरों को पकड़ते हैं। जहां पॉवर और पैसा है, वहां पुलिस भी अपराधी को नहीं पकड़ती। लोग भी इसी सिस्टम में जीने के आदी हो गए हैं, इसलिए इस सिस्टम में किसी रामराज्य जैसे बदलाव की उम्मीद करना बेमानी है।
मोनिका शर्मा, गृहणि, शक्तिनगर, भोपाल

>> लोगों में पुलिस का खौफ नहीं बचा है, पुलिस की वर्तमान भूमिका सिर्फ गाड़ी पकड़ना और चालानी कार्रवाई तक रह गई है। जिसमें भी लेनदेन कर कोई भी आराम से छूट सकता है।
विशाल सक्सेना, सहायक महाप्रबंधक आइडिया, एमपी चेप्टर

>> पुलिस को लेकर आशाएं ज्यादा हैं, पिछले दस सालों में शहर की आबादी दोगुनी हो गई है, लेकिन पुलिस बल की तादाद बरसों पुरानी है। शहर के प्रत्येक थाने में बल की भारी कमी है। ऐसे में शहर की सुरक्षा व्यवस्था कैसे हो। पुलिस को महानगरों की तर्ज पर सुरक्षा समितियां बनाकर, वरिष्ठ नागरिकों को उसमें आमंत्रित करना चाहिए। इसके साथ ही अपना सूचना तंत्र बढ़ाना होगा।
सौरभ गर्ग, संचालक, माय कार मोटर्स





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