इंदौर.
टॉक शो में बच्चों और सड़कों पर चलने वाले हर व्यक्ति की सुरक्षा को लेकर सड़कों की तरह लंबे और मुश्किल सवाल उठे। जिम्मेदार जवाबों के नाम पर महज पैचवर्क करते रहे। शुक्रवार को बस में चार घंटे तक 15 मासूमों ने ड्राइवर की सरेआम उद्दंडता भुगती।
क्या स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी सिर्फ फीस वसूलना और बसों को सड़कों पर लापरवाह छोड़ देना है? क्या चौराहों पर खड़े जवानों के आंख-कान नहीं हैं जो बच्चों की दहशत और बेखौफ दौड़ रही बस को देख-सुन नहीं पाए? ऐसे कई सवाल उठे और जिम्मेदार लोग बचाव की गलियां तलाशते रहे।
बस ड्राइवर के खिलाफ अपहरण का मुकदमा क्यों नहीं?
स्कूल बसों में बच्चों की सुरक्षा का जिम्मा आखिर किसका है? ..सवाल उठा तो सभी जिम्मेदार अपना पल्ला झाड़ एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करने लगे। जवाब किसी के पास नहीं। सभी अपनी खामियों से वाकिफ हैं और खामोशी से सबकुछ होते देख रहे हैं। अफसर उतना ही करना चाहते हैं जितने से काम चल जाए। कोई आगे आकर सूरत बदलने को तैयार नहीं।
शराबी ड्राइवर द्वारा 15 बच्चों को बंधक बनाकर चार घंटे तक शहर में बस लहराने की घटना को लेकर ‘भास्कर’ द्वारा कराए ‘टॉक शो’ में अफसर पूरे समय बचाव की कोशिश में लगे रहे। इसमें पुलिस, आरटीओ और शिक्षा विभाग के अफसरों के साथ वे लोग भी शामिल हुए जिनके परिजन दुर्घटना के शिकार हुए हैं।
शो में पहला सवाल उठा ड्राइवर पर 151 की कार्रवाई ही क्यों की? अपहरण का मुकदमा दर्ज क्यों नहीं हुआ। एएसपी महेशचंद्र जैन कहने लगे किसी ने शिकायत ही दर्ज नहीं कराई, जबकि स्कूल संचालक चंदा सिसौदिया बोलीं हमने सारी औपचारिकता पूरी कर गाड़ी छुड़वा ली है।
ड्राइवर का लाइसेंस तत्काल निरस्त नहीं करने का सवाल उठा तो एआरटीओ आर.पी. बिरथरे यह कहकर बचने की कोशिश करने लगे कि अब तक कोई शिकायत ही नहीं मिली। वैसे भी तत्काल निरस्त नहीं किया जा सकता। इसकी पूरी प्रक्रिया है।
मल्हारगंज के अमिताभ सिंघल ने कहा कार्रवाई के लिए शिकायतों का इंतजार आखिर कब तक करते रहेंगे। कितनी मौत के बाद प्रशासन जागेगा। दो साल पहले बेटी मंशा को खो चुके शीतल व संजय गर्ग ने कहा न तो तब गलियों में बस आने पर पाबंदी थी न अब है। आज भी हमें पता नहीं क्या कार्रवाई हुई है।
अब तक न पुलिस ने बयान लिए, न कोर्ट से नोटिस आया। श्री जैन ने यह कहकर बात टाल दी कि मैं तीन महीने पहले आया हूं इसलिए कुछ पता नहीं। मोहनलाल सेन जब कहा पुलिस का सारा ध्यान वसूली पर ही लगा रहता है तो श्री जैन तमतमाते हुए बोले आरोप लगाना आसान है। उनकी जगह ड्यूटी करके देखिए वे 18-18 घंटे काम कर रहे हैं।
इस पर श्री सिंघल ने कहा यह उनकी ड्यूटी है। इससे उन्हें अवैध वसूली का अधिकार नहीं मिल जाता। सवालों का रुख शिक्षा विभाग की ओर हुआ तो संयुक्त संचालक एस.बी. सिंह ने यह कहकर पुलिस व आरटीओ को ही कठघरे में खड़ा कर दिया कि एक ऑटो रिक्शा में 12-15 बच्चों को बैठाया जा रहा है वहां आप क्या कर रहे हैं? अफसर इतना ही कह पाए हम समय-समय पर कार्रवाई करते हैं।
सवालों की धार जब और तीखी हुई तो एडीशनल एसपी श्री जैन ने लोगों के ट्रैफिक सेंस को निशाना बनाया। उन्होंने कहा लोग क्यों हेलमेट और सीट बेल्ट नहीं लगाते। इस पर डॉ. ओमप्रकाश चौहान ने कहा यही लोग जब चंडीगढ़ जाते हैं तो सारे नियमों का पालन करते हैं। कोई बताने नहीं आता। लोगों में ट्रैफिक सेंस तो है हम ही नियमों का पालन नहीं कर पा रहे हैं। गुरु हरिकिशन पब्लिक स्कूल की डायरेक्टर श्रीमती आर.के. कलसी ने कहा लोग घरों के बाहर ही बस चाहते हैं। ऐसे में क्या करें?
जिम्मेदारी की बात आई तो सभी ने की बहानेबाजी
स्कूल
ड्राइवर के दोस्त को गाड़ी चलाने की अनुमति क्यों दी?
संचालक चंदा सिसौदिया ने कहा वह ड्राइवर ही था और देखभाल कर ही गाड़ी चलाने का मौका दिया।
बस में कोई सुपरवाइजर या शिक्षक क्यों नहीं था?
हमने शिक्षिका को भेजा था। उन्हें साथ लाई हूं। वहीं मौजूद शिक्षिका ने कह दिया मैं बस में नहीं थीं।
ड्राइवर के खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं कराई?
हमने पूरी कार्रवाई की है। पुलिस और आरटीओ दोनों को कहा। थाना हमारे कहने से नहीं चलता। (पुलिस और एआरटीओ ने शिकायत मिलने से इंकार किया।)
अभिभावकों से संपर्क क्यों नहीं किया?
हम आमतौर पर संपर्क करते रहते हैं। कल ही नहीं हो पाया।
पुलिस
ड्राइवर चार घंटे तक बच्चों को लेकर बस दौड़ाता रहा तो चौराहे-चौराहे तैनात पुलिसकर्मियों ने क्यों नहीं देखा?
कोई जवाब नहीं मिला।
ड्राइवर पर गंभीर धारा में अपराध क्यों कायम नहीं हुआ?
किसी ने एफआईआर दर्ज नहीं कराई।
गाड़ियों की गति सीमा का पालन क्यों नहीं कराया जाता?
पालन करा रहे हैं। तभी रोहित शुक्ला व कृष्ण गोयल ने कहा दो दिन पूर्व ही ट्रक मेरे दोस्त तुषार को कुचल चुका है।
आरटीओ
प्रतिबंधित क्षेत्रों में बसें कैसे बेधड़क घुस रही हैं?
ऐसे किसी प्रतिबंध की जानकारी नहीं।
ओवरलोडिंग पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
कार्रवाई कर रहे हैं। इस पर संयुक्त संचालक शिक्षा बोले रोज रिक्शा 12-15 बच्चों को ले जाते हुए देखे जा सकते हैं।
ड्राइवर का लाइसेंस तत्काल निरस्त क्यों नहीं हुआ?
इसकी पूरी प्रक्रिया है। उसके अनुसार ही कार्रवाई कर सकते हैं। हमारे पास कोई शिकायत भी नहीं आई है।
स्कूलों में अनफिट बसें बेरोकटोक कैसे चल रही हैं?
हर साल बसों का फिटनेस टेस्ट होता है।
लाइसेंस बनाने की प्रक्रिया पर दलालों का एकाधिकार कब खत्म होगा?
एकाधिकार है ही नहीं। तभी कई लोग बोले आप कहें तो दो हजार रुपए देकर घर बैठे लाइसेंस बनवा सकते हैं।
अक्षम ड्राइवर के लिए विभाग दोषी क्यों नहीं ?
विभाग उस व्यक्ति को लाइसेंस देता है, जिसे गाड़ी चलाना आती है। भारी वाहनों के लिए लाइसेंस पुलिस रिपोर्ट के बाद ही दिया जाता है।
सुझाव
स्कूल बसों में दो ड्राइवर व सुपरवाइजर रखे जाएं।
स्कूल बस के ड्राइवर को अलग से ट्रेनिंग और अतिरिक्त लाइसेंस दें।
ड्राइवरों के पास मोबाइल फोन हो, जिसका नंबर अभिभावकों के पास भी रहे।
गाड़ियों पर स्कूल व प्राचार्य का नंबर लिखा रहे।
बसों के स्टॉप तय हों और बच्चों की संख्या के अनुपात में बसें हों।
गलियों में बसों का प्रवेश बंद कर दें।
तय किया जाए कितनी पुरानी गाड़ियां स्कूल बस के रूप में चल सकती हैं।
जेब्रा क्रासिंग और फुटपॉथ ठीक किए जाएं।