नई दिल्ली. डॉ. अमित कुमार द्वारा चलाए जा रहे कथित किडनी रैकेट ने देशभर में भले ही सनसनी फैला दी हो, लेकिन अंगों का ऑनलाइन व्यापार संभावित दानदाताओं और खरीददारों के लिए बेहतरीन ढंग से फल-फूल रहा है। मौजूदा कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए ‘ऑरकुट’ और ‘फेसबुक’ जैसी सामाजिक नेटवर्किग साइटों का खुले तौर पर इस्तेमाल किडनी पाने के स्रोत के रूप में हो रहा है।
ऑनलाइन किडनी बाजार : इन साइटों पर ढेरों ऐसे समूह हैं, जो किडनी की खरीद-फरोख्त में रुचि रखने वाले लोगों को समर्पित हैं। कॉलेज छात्र असलम से लेकर सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल कुलकर्णी तक कई लोग ऑनलाइन किडनी बाजार में घुसने के लिए नेट खंगाल रहे हैं। ऐसे खास समूहों की लोकप्रियता का अंदाज इनके सदस्यों की बड़ी संख्या से लग जाता है। ‘ऑरकुट’ में 35 किडनी प्रत्यारोपण समूहों के 700 से अधिक सदस्य हैं। ‘फेसबुक’ में ऐसे हजारों सदस्य हैं, जो कि दुनियाभर में फैले हैं। इनमें से कई भारतीय भी हैं।
‘ऑरकुट’ का दावा है कि उसने अपनी नीतियों के मुताबिक विषयवस्तु की समीक्षा की है और इन नीतियों का उल्लंघन करने वालों को हटा दिया गया है। इंटरनेट को न केवल दानदाता, बल्कि संभावित प्राप्तकर्ता और उनके रिश्तेदार भी खंगाल रहे हैं। ऐसे समूह के तकरीबन हर संदेश के साथ ई-मेल पते और यहां तक कि सेल फोन नंबर भी दिए होते हैं।
अपनी-अपनी मजबूरियां: बेंगलूर में ड्राइवर श्रुजन के मुताबिक, वह 6.50 लाख रुपए में अपनी किडनी बेचना चाहता है, ताकि लिवर की बीमारी से जूझती बहन के उपचार के वास्ते लिए गए छह लाख रुपए के कर्ज को उतार सके। कुलकर्णी टेस्ट ट्यूब बेबी की चाहत में पांच लाख रुपए में अपनी किडनी बेचने को तैयार हैं।
..तो कुछ ऐसे भी: इंटरनेट पर उपलब्ध ऑनलाइन संदेशों में से ज्यादातर व्यावसायिक किस्म के हैं, लेकिन कुछ में यह भी कहा गया है कि वे मानवता की सेवा के लिए किडनी दान करना चाहते हैं। किडनी दान की इच्छा रखने वाले संतोष कुमार कहते हैं, ‘मेरा मानना है कि मानवता की सेवा ईश्वर की सेवा है। जरूरतमंद की मदद मेरा मकसद है।’
* ‘भारत में व्यावसायिक रूप से किडनी दान करना अवैधानिक है और ऐसे समूहों की गतिविधियां हमारी शर्र्तो और सामुदायिक मानकों के खिलाफ हैं’।
-विनय गोयल, प्रोडक्ट हेड, गूगल इंडिया