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देश की संप्रभुता व अखंडता को बंधक बनाती राजनीति

आलेख. india अपने पार्टी मुख्यालय में बैठकर राज ठाकरे मंद-मंद मुस्करा रहे होंगे। हरएक पार्टी कार्यालय में मदद की गुहार लगाने पहुंचने वाले इक्का-दुक्का लोगों को छोड़कर विरान सा दिखने वाला उनका पार्टी मुख्यालय अचानक सरगर्मी का केंद्र जो बन गया है।

विभिन्न चैनलों की ओबी वैन और हाथ में माइक व कैमरा पकड़े पत्रकार इन दिनों बाहर डेरा सा डाले हुए हैं। यही तो है सफलता की निशानी, मीडिया से घिरे रहना। एक जहर बुझे भाषण और उसके बाद उनके सिपाहसालारों के उग्र तेवरों ने गुमनामी के अंधेरे में डूब रही पार्टी को बचा जो लिया है।

इसके बाद जो हुआ उसे हम सभी ने देखा है। महानगर के रूप में विख्यात मुंबई की प्रतिष्ठा में एक और दाग लगा, मुक्त समाज रूपी हमारी मूर्छित संस्था को एक और धक्का लगा, रोजमर्रा की जिंदगी में लोगों को भयभीत होने का एक और कारण मिला.. जाहिर है यह सब पर्याप्त नहीं था। एक मासूम इंसान को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। लाखों रुपए की संपत्ति को नुकसान पहुंचा।

महाराष्ट्र में अपनी इकाईयां स्थापित करने की सोच रहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब नए सिरे से सोच-विचार पर मजबूर हैं। लेकिन क्या इनमें से किसी भी कारण ने युवा ठाकरे के पेशानी पर बल लाने का काम किया। उन्होंने तो भड़काऊ नेता के खिताब पर कब्जा जमा लिया, जो वे मानते थे कि उनका ही हक है, लेकिन बाला साहेब ठाकरे ने उसे देने से इंकार कर दिया था।

ऐसा कदापि नहीं है। हम सभी जानते हैं कि अक्सर किसी पार्टी विशेष के राजनीतिक हित राष्ट्रीय हित के खिलाफ हो जाते हैं। भारतीय राजनीति के प्रति राज ठाकरे का योगदान उन जैसे अनगिनत नेताओं के योगदान के आगे एक पृष्ठ भर से अधिक नहीं होगा। ऐसे उदाहरणों की याद ताजा करने के लिए दिमाग पर बहुत अधिक जोर भी नहीं देना पड़ेगा।

कुछ ही दिन पहले लंबी टालमटोल के बाद केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ा दिए। जरा सी भी बुद्धि रखने वाला कोई भी शख्स समझ सकता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आसमान छूते तेल के दामों के मद्देनजर ऐसा अवश्यंभावी ही था। इस बात को सिवाय वामपंथियों को छोड़कर कोई भी समझ सकता है।

इसके बावजूद माकपा ने पेट्रो उत्पादों में मूल्यवृद्धि के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन छेड़ने का निर्णय कर लिया है। भाजपा ने भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाने की घोषणा कर दी है। यानी और आंदोलन और फलस्वरूप और भी अधिक हिंसा। परिणाम उत्पादकता में और कमी आना।

फिर भी यह सब इसलिए ताकि वामपंथी आमजन के हितों की रक्षा का दावा कर सकें। उस आमजन के हितों की रक्षा का जो गाड़ियों में सफर करता है। माकपा वास्तव में इन दिनों खुशी से फूली नहीं समा रही होगी। आखिरकार उसने अमेरिका के साथ परमाणु करार को पलीता जो दिखा दिया। भले ही हमें अब ऐसा सुनहरा अवसर शायद ही कभी हासिल हो।

इसके अलावा कुछ व्यक्ति विशेष से जुड़े उदाहरण भी हैं। भाजपा में नरेंद्र मोदी की हैसियत और राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव गुजरात में हुए राज्य सरकार प्रायोजित विभत्स नरसंहार के लिए ही तो है। यही नहीं पार्टी में उनके वरिष्ठ नेता और हमारे अगले प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखने वाले लालकृष्ण आडवाणी का भी पार्टी में कद और पार्टी की देश में स्थिति विभाजनकारी रथयात्रा और अयोध्या में विवादास्पद ढांचे को ढहाने के कारण ही है।

इसे विडंबना नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे कि ये दोनों ही नेता और भी ऊंची आवाज में देश पर मंडराते आंतकवाद रूपी खतरे की बात करते हैं। इसपर इसलिए भी आश्चर्य होता है कि यही दोनों नेता भारत में आतंकवाद के विस्तार की जड़ में हैं!

राष्ट्रीय हित के खिलाफ जाने वाले पार्टी विशेष के राजनीतिक हित से जुड़े तमाम अन्य उदाहरण भी प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं। इंदिरा गांधी के तमाम प्रमुख निर्णयों को इस वर्ग में रखा जा सकता है। यह उनका ही निर्णय था कि रियासतों को मिलने वाले प्रिवी पर्स को बंद कर दिया जाए तो बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाए।

फिर उन्होंने इनके सिरमौर करार दिए जा सकने वाले निर्णय आपातकाल को देश पर थोपने का काम किया। एक लिहाज से देखें तो प्रत्येक लोकतंत्र में ऐसा ही कुछ कमोबेश मात्रा में देखने को मिल जाएगा, लेकिन विकसित देशों में राजनेताओं की गुणवत्ता, विपक्ष की मजबूती और मतदाताओं की गंभीरता राजनेताओं को ठाकरे सरीखी विध्वंसक राजनीति करने से रोकती है।

तो क्या हमें आने वाले कुछ समय तक हिंसक झड़पों के साथ ही जीवन गुजारना होगा? बगैर किसी संदेह के इसका जवाब हां में है। खासकर इसलिए भी क्योंकि वे बंटवारे की राजनीति के अलावा तथाकथित आर्थिक मसलों पर भी अराजकता फैलाने से बाज नहीं आते।

नंदीग्राम में ममता बनर्जी और माकपा का टकराव इसका हालिया उदाहरण है। नतीजतन जब तक विकास का स्तर और भी ऊंचा नहीं हो जाता या जब तक हमारे राजनेता अप्रासंगिक नहीं हो जाते तब तक तो हमें इस तरह की अंधी सुरंग में ही जिंदगी बितानी होगी। दूसरी स्थिति तो कभी आनी ही नहीं है!

लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।





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