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प्रैगनेंसी में डायबिटीज

प्रैगनेंसीके दौरान शरीर में ऐसे हार्मोन्स बनते हैं, जो खून के शुगर का स्तर बढ़ा देते हैं। कोख में बच्च हर समय मां से शुगर लेता रहता है, इसलिए खून में शुगर का संतुलन बना रहता है। लेकिन यदि यह संतुलन बिगड़ जाए और खून में शुगर की मात्रा बढ़ जाए, तो प्रैगनेंसी के दौरान डायबिटीज होने का खतरा बढ़ जाता है।

कुछ महिलाओं को प्रैगनेंसी से पहले ही शुगर की समस्या होती है, जबकि कुछ में पांचवें महीने (20 हफ्ते) बाद ब्लड शुगर की मात्रा बढ़ जाती है। इसे जैस्टेशनल डायबिटीज कहते हैं। पेट के अंदर की फैट से डायबिटीज का खतरा काफी बढ़ जाता है। यदि संभव हो तो प्रैगनेंसी प्लान करने से पहले किसी कुशल गाइनोकॉलोजिस्ट से परामर्श अवश्य कर लें।

क्यों होता है?- वंशानुगत।- प्रेगनैंसी में मां का वजन ज्यादा बढ़ना।- बच्चे की ग्रोथ व वजन बहुत ज्यादा होना।

जांच

यदि खून में शुगर की मात्रा बढ़ी हुई हो, तो उन महिलाओं की खाली पेट ब्लड शुगर स्क्रीनिंग की जाती है और उनमें पोस्ट पोरैंडियल टैस्ट एक घंटे के बाद या दो घंटे के बाद किया जाता है। जिन महिलाओं में डायबिटीज की फैमिली हिस्ट्री हो, प्रैगनेंसी के दौरान वजन बहुत •यादा बढ़ जाए या बच्च बहुत हैल्दी हो, पेट में बिना किसी कारण पानी ज्यादा हो और पोस्ट पेरैंडियल लैवल ज्यादा हो, उनका कंप्लीट ग्लुकोज टॉलरेंस टैस्ट करवाया जाता है।

ठीक हो सकता है

जिस तरह कई महिलाओं को प्रैगनेंसी के दौरान हाई ब्लड प्रैशर की शिकायत हो जाती है और डिलीवरी के बाद यह ठीक हो जाता है, उसी तरह जैस्टेशनल डायबिटीज ठीक हो सकती है। ऐसी महिलाओं में सारी जिंदगी डायबिटीज होने की संभावना बनी रहती है। यदि वे अपने वजन पर नियंत्रण रखें, नियमित तौर पर हल्के-फुल्के व्यायाम करें, संतुलित व पौष्टिक आहार लें, नियमित सैर करें तो इससे बच सकती हैं।

भोजन पौष्टिक हो

दिन में थोड़े-थोड़े समय के अंतराल पर थोड़ी मात्रा में खाना खाते रहें। रात को सोने से पहले दूध जरूर लें। मौसमी फलों को भोजन का हिस्सा बनाएं। शुगर, काबरेहाइड्रेट्स और फ्राइड भोजन से परहेज करें। ज्यादा नमक खाने से शरीर में वॉटर रिटैंशन बढ़ जाता है, जिससे शरीर में सूजन आ जाती है। इससे बाद में ब्लड प्रैशर बढ़ सकता है। इसलिए प्रैगनेंसी के दौरान नमक कम इस्तेमाल करें। चटनी, आचार, सॉस कम मात्रा में लें। हाई फाइबर युक्त डाइट लें। रिफाइंड फ्लार का इस्तेमाल न करें। सिर्फ चावल, आलू, शकरकंदी, चाट-पकौड़े और फास्ट फूड से अपना पेट न भरें। इन खाद्य पदार्थाे के स्थान पर पौष्टिक आहार जैसे अंकुरित चना, मूंग, सोयाबीन, रसीले फल, दूध, सलाद, लस्सी व ताजा पनीर लें। आयरन, फोलिक एसिड और कैल्शियम की गोलियां अवश्य लें। डिलीवरी अस्पताल में ही करवाएं।

घी ज्यादा न लें

अक्सर महिलाएं प्रैगनेंसी के दौरान घी का काफी ज्यादा इस्तेमाल करती हैं। ज्यादा घी खाने से ब्लड प्रैशर और खून में शुगर की मात्रा बढ़ने की संभावना रहती है। इसलिए पौष्टिक भोजन लेना चाहिए, न कि ऐसे पदार्थ, जिनसे फैट बढ़े।

कुछ खास टिप्स

- प्रसन्न्चित्त व शांत रहें

- भारी वजन न उठाएं

- बार-बार सीढ़ियां चढ़ने-उतरने से परहेज करें

- समय पर टिटनेस के टीके लगवाएं

- एक करवट बांई ओर लेटें

- हीलदार चप्पल न पहनें

- डॉक्टर के परामर्श के बाद ही दवा खाएं, समय-समय पर डॉक्टर से चेकअप करवाती रहें।

- अत्यधिक क्रोध व आवेश पर नियंत्रण रखें।

आजकल घरों में यह मान्यताएं प्रचलित हैं कि इस दौरान महिलाओं को दो के हिस्से का खाना चाहिए इसी कारण प्रेगनेंसी के दौरान कई बार ज्यादा डाइट के कारण महिलाओं में डायबिटीज हो जाती है जोकि महिला व बच्चे दोनों के लिए ही खतरनाक है। ऐसे में क्या करें कि बच्चे को डाइट भी पूरी मिले व महिला को इस प्रकार की बीमारियों का सामना भी न करना पड़े।

डॉ. रेखा वर्मा, गाइनोकॉलोजिस्ट ईएसआई अस्पताल, पानीपत





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