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बड़ी कंपनियां भी शामिल हैं इस कारोबार में

ग्वालियर. दूध और देसी घी में मिलावट का काम छोटे स्तर पर ही नहीं हो रहा, बल्कि इसमें कई बड़ी कंपनियां भी शामिल हैं। यह कंपनियां विदेशों से आयातित बटर आयल का इस्तेमाल घटिया क्वालिटी के सपरेटा दूध और मिलावटी घी को ठिकाने लगाने में कर रही हैं।

ग्वालियर अंचल में दूध की उपलब्धता मांग के अनुरूप नहीं है, इस कारण दूध को लेकर बड़े स्तर पर दूध व दूध उत्पाद का कारोबार करने वाली इकाइयों ने इसका विकल्प खोज लिया है। यही विकल्प छोटे व्यापारियों की परेशानी का कारण बना हुआ है।

अंचल में गाय-भैंस के दूध में रिचर्ड मेंशन (आरएम) वैल्यु 32 तक आसानी से मिल जाती है लेकिन खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम में दूध की रिचर्ड मेंशन (आरएम) वैल्यू 28 तक पास है। यहीं से गड़बड़ी की शुरुआत होती है। किसान या फिर दूध संग्रहण केंद्र के कर्ता-धर्ता शुद्ध दूध में मिलावट करके आरएम को मानक स्तर पर ले आते हैं।

बड़ी दूध इकाइयों का काम यही से शुरू होता है। छोटी इकाइयां आरएम वैल्यू 28 से कम होने की स्थिति में दूध को स्वीकार नहीं करतीं लेकिन बड़ी इकाइयां प्रतिस्पर्धा के चलते 20 आरएम तक का दूध आसानी से खरीद लेती हैं। उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं होता कि दूध में किस प्रकार की मिलावट की गई है। इसकी वजह यह होती है कि इन इकाइयों के पास बटर आयल रहता है, जिसे दूध में मिलाकर वे आरएम वैल्यू को मानक स्तर पर ले आते हैं।

कुछ इकाइयां इससे भी आगे चली जाती हैं, अर्थात तैयार किए गए घी की आरएम वैल्यू को मैंटेन करने के लिए बटर आयल की मिलावट कर दी जाती है, जो पीएफए एक्ट का खुला उल्लंघन है।

वर्ष 2002 में बिना सैनिटरी इम्पोर्ट परमिट के बटर आयल आता था। इस पर कृषि मंत्रालय ने न्यूजीलैंड से आए बटर आयल को बंदरगाह पर डम्प करवा दिया, जिस पर देश के छह प्रमुख घी निर्माताओं ने लिखकर दिया कि उनके द्वारा बटर आयल का इस्तेमाल घी में नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद कुछ कंपनियां घी में जमकर बटर आयल का उपयोग कर रही हैं।

सूत्रों के मुताबिक, एगमार्क व आईएसआई सर्टिफिकेट के चलते बड़ी इकाइयां अपने परिसर में बटर आयल नहीं रखतीं। ग्वालियर अंचल के एक औद्योगिक क्षेत्र में स्थित एक बड़ी घी इकाई ने बटर आयल को रखने के लिए आसपास के गांवों में बड़े-बड़े गोदाम किराए पर लिए हुए हैं और यहां से जरूरत के अनुसार बटर आयल फैक्ट्री में पहुंचता रहता है।

अलबत्ता तो खाद्य एवं औषधि प्रशासन, जिला प्रशासन व अन्य महकमों की टीमें इस बड़ी इकाइयों पर हाथ ही नहीं डालती हैं और यदि किसी दबाव के चलते कोई टीम पहुंच भी जाती है, तो गड़बड़ी उजागर करने की बजाय लेनदेन करके दबा दी जाती है।

सूत्रों के मुताबिक खाद्य एवं औषधि प्रशासन की एक टीम गत वर्ष ऐसी ही एक इकाई में पहुंच गई थी लेकिन इकाई के अमले ने जांच दल को यह कहकर गुमराह किया कि बटर आयल दूध पाउडर में मिलाया जाता है। जब यह प्रक्रिया बताने को कहा गया, तो सच सामने आ गया। इसी प्रकार एक इकाई में मौजूद बटर आयल के ड्रमों को जब्त करने की नौटंकी भी एक जांच दल ने की थी, किंतु यह मामला भी रफा-दफा कर दिया गया।

यहां बता दें कि देसी घी व बटर आइल देखने में लगभग एक जैसे रहते हैं और दोनों ही मिल्क फैट से तैयार होते हैं लेकिन दोनों के बनाने की प्रक्रिया अलग है। आयातित बटर आइल हाई फैट व बटर को वैक्यूम (जहां हवा भी न हो) के भीतर तैयार किए जाता है और इसकी यूनिट करोड़ों रुपये में तैयार होती है। इसके विपरीत देसी घी खुली कड़ाही में आंच पर बनता है और इसमें वैक्यूम नहीं रहता। बटर आइल में नमी होती है जबकि देसी घी नमी रहित होता है।

>> यह हर व्यक्ति के जीवन से जुड़ा मुद्दा है। इसलिए ऐसा करने वालों के खिलाफ कठोर से कठोर कार्रवाई होना चाहिए इस संबंध में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से चर्चा की जाएगी।
अभय चौधरी जिलाध्यक्ष भाजपा ग्वालियर

>> मिलावट दूध व दूध उत्पादों में ही नहीं, बल्कि अन्य खाद्य पदार्थो में भी हो रही है। जब तक मिलावट रोकने के लिए कोई कठोर नीति नहीं बनाई जाएगी, तब तक इस समस्या से मुक्ति नहीं मिल सकती।
प्रकाश खंडेलवाल अध्यक्ष शहर जिला कांग्रेस ग्वालियर

>> दूध व दूध उत्पादों में मिलावट की जितनी भी भत्र्सना की जाए कम है। ऐसा करने वाले हमारे बच्चों के जीवन से खेल रहे हैं। कानून के रक्षक अपनी जिम्मेदारी ढंग से नहीं निभाते हैं।
गोपालदास लड्ढा अध्यक्ष मप्र चेंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज ग्वालियर





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