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Madhya Pradesh
Gwalior Gwalior ग्वालियर.
आनेवाला वक्त शहर में भारी पेयजल संकट पैदा करने वाला होगा। अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक 31 मार्च के बाद तिघरा डैम शहर को पेयजल मुहैया कराने में असमर्थ होगा। इस आसन्न संकट के लिए प्रकृति के साथ नगर निगम प्रशासन भी कम जिम्मेदार नहीं है। पिछले एक वर्ष में 14 हजार 400 लाख गैलन पानी नालियों में बहा दिया जो शहरवासियों के लिए 4 माह 8 दिन के लिए पर्याप्त होता।
शहर की पेयजल व्यवस्था के लिए नगर निगम परिषद की बैठकों से लेकर मंत्रिमंडल में चिंता व्यक्त कर लंबी चौड़ी योजनाओं पर बहस तो की जा रही है लेकिन पानी की बर्बादी के प्रति कोई गंभीर नजर नहीं आता है।
नगर निगम के सामने यह बात वर्ष 2005 में ही आ गई थी कि शहर को मोतीझील फिल्ट्रेशन प्लांट से जितने पानी की आपूर्ति की जा रही है उसका 60 प्रतिशत पानी ही लोगों तक पहुंच पा रहा है शेष 40 प्रतिशत पानी बर्बाद हो रहा है।
सूत्रों के मुताबिक इसके लिए एशियन विकास बैंक से ऋण लेकर निगम द्वारा पहली बार अप्रैल 2006 में जल नलिकाओं में लीकेज चिह्न्ति कर उनके दुरुस्तीकरण की 115 लाख रुपए की योजना तैयार की गई परंतु अब तक इस पर अमल नहीं हो पाया है। नतीजतन शहर के सामने पानी का भयंकर संकट खड़ा हो गया है।
यह है टेंडर की प्रक्रिया
पानी की बर्बादी के लिए केवल नगर निगम ही दोषी नहीं है राज्य शासन की भी इसमें अहम भूमिका है। लीकेज डिटेक्शन के लिए प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटेशन यूनिट (पीआईयू) जिसके मुखिया निगमायुक्त होते हैं, ने प्रोजेक्ट बनवा कर राज्य शासन को भेजा।
भोपाल में बैठी प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट (पीएमयू) ने प्रोजेक्ट का तकनीकी परीक्षण करा कर उसे स्वीकृति दी। इसके बाद प्रोजेक्ट पर टेंडर बुलाने के लिए मेयर इन काउंसिल (एमआईसी) ने अनुमति दी। इस पर भी जब टेंडर ज्यादा दरों के आए तब एडीबी ने निगम को कहा कि आपके प्रोजेक्ट की दरों में खामी है इसलिए प्रोजेक्ट रिवाइज किया जाए।
पानी के लिए कवायद
1 अप्रैल से 31 अगस्त 08 तक शहर की जनता को पानी मिल सके इसके लिए राज्य शासन ने ककैटो से तिघरा डैम तक पानी लाने की योजना स्वीकृत की है। इस पर साढ़े बारह करोड़ रुपए खर्च हो रहा है।
>> प्रदेश में ग्वालियर नगर निगम ही एक मात्र ऐसा नगर निगम है जो लीकेज डिटेक्शन के लिए काम कर रहा है। इसके लिए टेंडर बुलाए जा रहे हैं।
डा. पवन शर्मा नगर निगम आयुक्त, ग्वालियर
ऐसे हो रही है पानी की बर्बादी
नगर निगम के रिकार्ड के अनुसार शहर को एक दिन छोड़ कर 200 लाख गैलन शोधित जल उपलब्ध कराया जाता है। इसमें से 40 प्रतिशत यानी 80 लाख गैलन पानी बर्बाद हो जाता है। जो साल भर में 14400 लाख गैलन होता है। यदि लीकेज दुरुस्त करा कर इतने पानी को बर्बाद होने से रोक लिया जाता तो शहर को एक दिन छोड़कर 4 माह 8 दिन तक पानी अतिरिक्त उपलब्ध कराया जा सकता था।
इसलिए हुआ पानी बर्बाद
लीकेज डिटेक्शन के लिए निगम ने 115 लाख रुपए का एस्टीमेट तैयार कर पहली बार 6 अप्रैल 2006 को टेंडर बुलाए। दरें अधिक आईं इसलिए अस्वीकृत किए गए। दूसरी बार 29 सितंबर 06 को पुन: टेंडर बुलाए गए फिर दरें लगभग वही आईं।
इस बार एडीबी ने न्यूनतम निविदाकार से समझौता करने के लिए निगम को कहा। समझौता नहीं हो पाया। तीसरी बार 3 जुलाई 07 को टेंडर बुलाए गए इस बार भी दरें लगभग प्रथम बार के बराबर आईं। इस बार एडीबी ने कहा कि अपना एस्टीमेट रिवाइज करें। अब दरें रिवाइज कर 146 लाख रुपए कर दी गई हैं परंतु टेंडर नहीं बुलाए गए हैं।
लगभग चार करोड़ हुए बर्बाद
नगर निगम के रिकार्ड के अनुसार 1 एमजीडी पानी को मोतीझील फिल्ट्रेशन प्लांट पर शोधित करने में 25 हजार 875 रुपए का खर्च आता है। निगम के रिकार्ड के अनुसार ही एक साल में 14400 लाख गैलन पानी बर्बाद किया जा चुका है जिसको शोधित करने में निगम ने 3 करोड़ 72 लाख 60 हजार रुपए खर्च किए।