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सिरपुर में हाईटेक सुरक्षा घेरा ठप

रायपुर. sirpur सिरपुर में बेशकीमती पुरा वस्तुओं की सुरक्षा के लिए लगाया गया बायोमैट्रिक सिक्योरिटी सिस्टम बंद हो गया। कीमती मूर्तियों की चोरी के बाद मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने यह सिस्टम आन किया था। बताते हैं कि मेंटेनेंस नहीं होने से यह कुछ महीने में ही बंद हो गया। सिरपुर जैसे बड़े परिसर की सुरक्षा चंद लाठीधारी चौकीदारों के हाथों में हैं। इस दौरान कितनी मूर्तियां चोरी हो गईं, कोई नहीं जानता।

छत्तीसगढ़ के सबसे चर्चित पुरातात्विक स्थल सिरपुर से जैसे-जैसे पुरातात्विक महत्व की वस्तुएं मिल रहे हैं, वैसे-वैसे इन वस्तुओं पर खतरा भी बढ़ता जा रहा है। बायोमैट्रिक सिस्टम बंद होने से कई एकड़ इलाके में बिखरा पुरावैभव फिर खतरे में है। सुरक्षा घेरे में इतनी गड़बड़ियां आ गई हैं कि बताते हैं, अब इसे सुधार पाना भी कठिन है।

यह सिक्योरिटी सिस्टम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) ने लगवाया था। विभाग ने इसे बदलना तो दूर, ठीक करना भी मुनासिब नहीं समझा। सूत्रों के मुताबिक सुरक्षा घेरा लगा तो दिया गया था, लेकिन इसे आपरेट करने की कोई तैयारी नहीं थी। इसकी जानकारी रखनेवाला एक भी तकनीकी कर्मचारी भर्ती नहीं किया गया।

दो साल पहले डा. सिंह ने सिरपुर के प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर और दो संग्रहालय में यह सिस्टम शुरू किया था। एएसआई के रायपुर मंडल प्रमुख सीएलएन शास्त्री ने बताया कि सिस्टम सप्लाई करनेवाली एजेंसी को कई बार सूचित किया गया कि सिस्टम बंद पड़ा है। फिर भी सुधार नहीं किया गया। इस वजह से एजेंसी का पेमेंट भी रोका गया है।

ऐसा हो सिक्योरिटी सिस्टम
सिरपुर के विपुल पुरावैभव की सुरक्षा के लिए बायोमैट्रिक सिक्योरिटी सिस्टम लक्ष्मण मंदिर के मुख्य द्वार तथा दो संग्रहालयों में लगाया गया। इनमें सिरपुर उत्खनन से मिली महत्वपूर्ण सामग्री सहेज रखी गई हैं। इसे कंप्यूटर से आपरेट किया जाता है।

आटोमैटिक लाक तभी खुलता है, जब सेंसर पर अधिकृत व्यक्ति का अंगूठा पड़ता है। इसे जबर्दस्ती खोलने की कोशिश करने पर हूटर बजने लगते हैं। इसकी आवाज ढाई से तीन किमी दूर जाती है। हाईटेक सिक्युरिटी सिस्टम से पास के थाने से जोड़ने का भी प्लान था।

सिरपुर में उत्खनन
पुराविदों के मुताबिक सिरपुर में सबसे पहले व्यवस्थित उत्खनन 1952 से 55 तक डा. एमजी दीक्षित के निर्देशन में टीलों की खुदाई कराई गई। इसमें दो बौद्ध विहार और शिवमंदिर के अवशेष मिले थे। उसके बाद 1999 में नागपुर के भंते नागाजरुन सरंग सुसाई ने वहां उत्खनन कराया, जिसके निर्देशक पुरातत्वविद जेपी जोशी थे।

2004 से अब तक वहां राज्य पुरातात्विक सलाहकार डा. एके शर्मा के निर्देशन में खुदाई चल रही है। सिरपुर जितनी बड़ी आर्कियोलाजिकल साइट आसपास के कई राज्यों में नहीं है। यह पांच वर्ग किमी के विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ है। छोटे-बड़े 185 टीले हैं, जिनमें से अब तक केवल 23-24 का उत्खनन हो पाया है।

गौरवशाली इतिहास
पुराविद डा. शिवाकांत वाजपेयी ने बताया कि सिरपुर प्राचीन राज्य दक्षिण कौशल की राजधानी थी। इसका सबसे पहले शरभपुरी शासकों के ताम्र अभिलेख में ‘श्रीपुर’ के नाम से उल्लेख मिलता है। बाद में इसका नाम सिरपुर प्रचलित हुआ।

इस राज्य के सबसे प्रतापी शासक पांडूवंशीय महाशिव गुप्त बालाजरुन हैं, जिनके शासनकाल (595 से 655 ई.) में सिरपुर की ख्याति सबसे ज्यादा थी। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग के सिरपुर आने का उल्लेख मिलता है। उन्होंने अपने यात्रा वृतांत में दक्षिण कौ़शल की राजधानी के रूप में इसका उल्लेख किया है। डा. एमजी दीक्षित ने अपने उत्खनन लेखों से स्पष्ट है कि सिरपुर शरभपुरी, पांडूवंशीय और कल्चुरी शासकों की राजधानी रही है।

पुरानिधी इधर-उधर
1939 के सिरपुर उत्खनन से मिली ज्यादातर मूर्तियां इधर-उधर हो गईं। जानकार सूत्रों के मुताबिक वहां से 60 से ज्यादा कांस्य प्रतिमाएं मिली थी, जिनमें से आधा दर्जन चोरी चली गईं। कुछ के अमेरिका बोस्टन म्यूजियम में तो कुछ एल्फिंस्टन संग्रहालय में होने का पता चला है। मुंबई और नागपुर के संग्रहालय में भी यहां की पुरानिधि होने की चर्चा है।

कब-कब चोरियां
अक्टूबर 2005 में अनंतशेष (लक्ष्मणमूर्ति)
जून 2005 में हरिती प्रतिमा
2001 में गरुड़ पर विराजे विष्णु प्रतिमा





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