HomeMagazineSahitya Sahitya

कितना अच्छा होता जो इसे परचम बना लेती

खेरबाली सचमुच सबके आंखों की किरकिरी बनी हुई है, किसी को यह सुहा रहा है तो कोई खींसे निपोर रहा है। लेकिन इतना तय है कि ब्लॉग उदय का यह नया प्रयास कुछ गुल जरूर खिलाएगा। ईमानदारी की चाशनी में घुटी ऐसी कोशिश शुरू की है मनीषा पांडे ने अपने ब्लॉग चोखेरबाली से। वह दिल से कहती हैं वे पतित होना चाहती हैं भले ही इसके समानांतर अच्छी लड़की होने के नाम से भावुक होकर आंसू टपकाती रहूं। मेरे जैसी और ढेरों लड़कियां हो सकती हैं, जो अपनी पतनशीलता को छिपाती फिरती हैं लेकिन अच्छी लड़की के सर्टिफिकेट की चिंता में मैं दुबली नहीं होऊंगी।

मनीषा ने कदम बढ़ाया तो कई आंखें फटी रह गईं और मुंह बाये देख रही हैं कि यह पतित पता नहीं क्या कर बैठे, पुरुष प्रधान समाज के किस मानदंड की बखिया उधेड़ दे..लेकिन अब कारवां बन चुका है।

बदलाव की आहट सुनाई देने लगी है और जिन्हें नहीं सुनाई देती उन्हें ये सुनने को मजबूर कर देंगी। उनके तेवर कुछ ऐसे हैं कि जिन पुरुषों ने समाज की परिभाषाएं गढ़ी हैं उनकी आंखों में अंगुलियां डालकर वे ऐलान करना चाह रही हैं कि तुम गलत हो। वे बताना चाह रही हैं कि ठीक से हंस लेना केवल तुम्हारा ही हक नहीं, पर्दे में रखकर तुमने गुनाह किया है। वे मांग रही हैं उस आजादी को जिसे पुरुषों ने अपने घर की बांदी बना रखी है।

वे उन छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिलाती हैं कि क्यों घर की लड़कियों को कहा जाता है छत पर नहीं जाओ, दुपट्टा हमेशा सिर पर रखो, किसी से ज्यादा हंस-हंस कर बात नहीं करो, मोहल्ले पर लड़कों की तरह न आया-जाया करो या फिर घर से बाहर ज्यादा देर तक नहीं रहो..।

असल में मनीषा के बाद पुनीता, सस्ता शेर और फिर मेरी कठपुतलियां.. जैसे ब्लॉग उन बातों को कह रही हैं जो वास्तव में अंधेरी कोठरी में पूर्णिमा के चांद की रोशनी फैला रही हैं। उनकी बातें एक सुहानी सुबह की ओर इशारा करती हैं। जरा सोचिए इस्मत चुगताई ने 1935 में उर्दू में ‘लिहाफ’ लिखी। तब इसे लेकर काफी विवाद हुआ था।

चुगताई ने उस समय ऐसी बातें कहने की हिम्मत दिखाई जब आज से ज्यादा मुश्किलें थीं। ६५ साल के बाद उस पर फिर चर्चा हुई और सन् 2000 में जाकर उसपर ‘फायर ’ फिल्म बनी। इसका भी काफी विरोध हुआ लेकिन वह राजनीतिक फायदे के लिए किया गया विरोध ही कहा जाएगा। कुछ दिनों पहले प्रदर्शित ‘वाटर’ के साथ भी ऐसा ही हुआ। मतलब जब-जब नारी मुक्ति की बात होगी तब-तब पुरुष मानसिकता वाले लोग यूं ही विरोध करेंगे।

अब ब्लॉग के द्वारा नारी मुक्ति की बातें फिर की जा रही हैं। उनकी बातें सदियों के अन्याय को सामने लाती हैं.. सच में.। अब छोटी-सी बात ही लीजिए क्या महिलाएं बिना बचपन के जवान हो जाती हैं। अब ठुमक-ठुमक चलत रामचंद्र, बाजत पैजनियां. पर केवल राम का ही हक क्यों है क्या केवल कृष्ण ही बाल लीलाएं कर सकते हैं..माता सीता या फिर राधा क्यों नहीं? वास्तव में कई महान विभूतियों ने अन्याय किया है।

अब कालिदास का अभिज्ञान शाकुंतलम उठा लीजिए या फिर मेघदूत हर जगह नारी सौंदर्य का चित्रण है उनकी भावनाएं उनके ख्यालात को कई जगह नहीं, क्यों? ब्रrापुराण में भी ऐसे चित्रण आपको मिल जाएंगे। कई और पक्ष हैं. बेटियों के ब्लॉग पर जब आप पुनीता से ‘बेटियों के ब्लॉग’ पर मुखातिब होते हैं तो वे बड़ी मासूमियत से कठोर सवाल पूछती हैं - बेटियां पराई क्यों होती हैं? एक बेटी की मां का हलफनामा शीर्षक का उनका लेख तो वास्तव में एक महिला के दर्द को शिद्दत से बयां करता है। मोहल्ला जैसे कई प्रमुख ब्लॉगर इन पर कान देने लगे हैं और यह बात उठी है कि प्रगतिशीलता को पतनशीलता कहने की मानसिकता कितनी सही है।

कुल मिलाकर एक कोशिश हो रही है इन बातों को कहने के लिए लाउडस्पीकर मुहैया कराने की जिससे बात सब तक पहुंचे, लेकिन शोर के रूप में नहीं, सार्थक अर्थो में और शब्दों के साथ। नारी मुक्ति की इस नई हवा को सच में सलाम करने को जी चाहता है। अंत में लखनऊ के एक प्रसिद्ध शायर का शेर याद आता है.

तेरे माथे पर जो आंचल है क्या खूब है

पर कितना अच्छा होता जो तुम इसे परचम बना लेती





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: