श्रीप्रकाश श्रीधरन. मैं तब पांचवीं कक्षा में पढ़ता था। हमारे स्कूल में एक खोई वस्तुओं का डिब्बा होता था, जहां आपकी खोई हुई चीज मिल जाया करती थी। कुछ ईमानदार विद्यार्थी स्कूल में पड़ी मिली चीजों को वहां स्वेच्छा से जमा करा देते थे। वह चीज जिसकी होती थी, उसे बतौर जुर्माना एक रुपए हेड मिस्ट्रेस को देना पड़ता था। इसके बाद वह अपनी खोई वस्तु को ले जा सकता था।
एक बार मैंने उस डिब्बे में आकर्षक पेन देखा और तय किया कि मैं एक रुपए का जुर्माना भर उसे हासिल कर लूंगा। ऐसा करने के बाद मुझे और दोस्तों को बड़ा मजा आया और हमने यह अपनी आदत में शुमार कर लिया। अब जो भी चीज हमें अच्छी लगती हम जुर्माना भरते और उसे ले लेते। एक बार मेरा पेंसिल बॉक्स खो गया और वह उसी खोई वस्तुओं के डिब्बे में आ पहुंचा। मैं जब वहां गया तो हेड मिस्ट्रेस उपलब्ध नहीं थी।
मैंने सोचा कि लंच के बाद मैं उसे वापस ले लूंगा। लेकिन लंच बाद मैं जब वहां पहुंचा तो वह वहां नहीं था। कोई और उसे जुर्माना भर ले गया था। मुझे निराशा तो हुई ही साथ में दुख भी हुआ, क्योंकि वह मेरा पसंदीदा बॉक्स था। लेकिन इस घटना ने मुझे एक न भूलने वाला सबक सिखाया। वह था दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार कदापि न करो जो तुम्हें अपने साथ किए जाने पर बुरा लग सकता है। आप भी जब इसे अपना लेंगे तो अहसास होगा,
1. टीम में परस्पर विश्वास की भावना बढ़ती है।
2. रवैये और सोच पर आप प्रभाव छोड़ सकते हैं।
3. टीम में नैतिकता की संस्कृति बढ़ेगी।
4. सामान्य आदमी बन असंभव की प्राप्ति के लिए टीम को प्रेरित करेंगे।
5. अपने साथियों के कल्याण के लिए कार्य करेंगे और उन्हें विकास पथ पर अग्रसर करेंगे।
-लेखक नेतृत्व प्रशिक्षण संस्था लीडकैप के संस्थापक हैं।