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खाली पड़े हैं कई महत्वपूर्ण पद

भोपाल. स्वास्थ्य विभाग में संचालक स्तर के 11 पद खाली हैं और संयुक्त संचालकों को पदोन्नति की प्रतीक्षा करते 10 साल से ज्यादा हो गए। इन्हें पदोन्नति देने की हालत में इनके पदों को भरने के लिए नियमित सीएमओ भी पर्याप्त नहीं हैं। ग्वालियर में विभाग के राज्यस्तरीय महत्वपूर्ण प्रशिक्षण केंद्र तक में कई सालों से नियमित पदस्थापना नहीं हो पाई है।

विभाग में संचालक और संयुक्त संचालकों के स्तर पर भी ढर्रा कामचलाऊ अंदाज में कायम है। अदालत से ताजा स्थगन लेकर आए संचालक डॉ. अशोक शर्मा समेत विभाग में इस समय चार में से तीन ही संचालक हैं।

गैस राहत में संचालक का पद प्रतिनियुक्ति से भरना है, जहां पूर्व में दो बार अशोक शर्मा और एक बार एमके जोशी भेजे जा चुके हैं। सूत्रों ने बताया कि बगैर सहमति से भेजे जाने के कारण दोनों ही अदालत से स्थगन ले आए। यानी संचालनालय से संचालकों के आवागमन के बावजूद फिलहाल गैस राहत में स्थाई इंतजाम नहीं हो पा रहा।

ब्यूरो में बदहाली: भोपाल में राज्य स्वास्थ्य सूचना ब्यूरो में रश्मि अरूण शमी के बाद संचालक का पद तत्कालीन संचालक डॉ. योगीराज शर्मा और डॉ. अशोक शर्मा के बीच झूलता रहा। फिर तत्कालीन कमिश्नर राजेश राजौरा ने इसका दायित्व संभाला। सूत्र बताते हैं कि जब डॉ. केके शुक्ला को इसका प्रभार मिला तो उन्होंने संभालने से इंकार कर दिया। इससे पूर्व व्यवस्था लागू मान ली गई। अस्पष्ट आदेशों के चलते इस पद पर अब तक असमंजस बरकरार है।

फैसला हुआ, पहल नहीं: बीते वर्ष सात संभागों में सात क्षेत्रीय संचालकों के पद का निर्णय सरकार ने लिया, लेकिन विभाग में पद सृजन की पहल महीनों बाद भी नहीं हो सकी है। इस तरह इन्हें मिलाकर संचालक के ही 11 पद खाली पड़े हैं।

दो साल में चार जाएंगे: संचालनालय में पदस्थ सात संयुक्त संचालकों और मौजूदा तीन संचालकों में से चार पद अगले दो साल में सेवानिवृत्ति के कारण खाली होने वाले हैं। सूत्रों के अनुसार डॉ केके शुक्ला, एमके जोशी और पीएनएस चौहान अगले साल जुलाई तक सेवानिवृत्त हो जाएंगे और एसके श्रीवास्तव जनवरी 2010 में।

पर्याप्त नियमित सीएमओ नहीं: संचालनालय के सात संयुक्त संचालक पिछले एक दशक से ज्यादा समय से पदोन्नति की प्रतीक्षा में कतारबद्घ हैं। यदि इनसे क्षेत्रीय संचालकों के नए पदों की पूर्ति कर दी जाती है तो हालत यह है कि इनकी जगह भरने के लिए विभाग के पास पर्याप्त संख्या में नियमित सीएमओ तक नहीं हैं।

जो हैं, उनमें से कई विभिन्न अनियमितताओं के कारण जांच की चपेट में चल रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि छह संभागों के लिए संयुक्त संचालकों की पिछली डीपीसी में सिर्फ दो नाम ही आगे बढ़ सके, बाकी नाम किसी न किसी जांच या सीआर के कारण ठंडे बस्ते में बरकरार हैं।

केंद्र में कोई नहीं: ग्वालियर स्थित प्रशिक्षण केंद्र में 1993 से सृजित संचालक के पद पर 12 साल से नियमित पदस्थापना नहीं हो सकी है। सूत्रों के अनुसार इसी केंद्र के पास विभाग के कार्यकर्ताओं से लेकर डॉक्टरों तक सबके प्रशिक्षण की बारहमासी जिम्मेदारी है।

इन हालातों पर दबी जुबान से अधिकारी कहते हैं कि अब तक विभाग की अंदरूनी संरचना को सुधारने की तरफ पर्याप्त ध्यान दिया ही नहीं गयौ। ऊपर से नीचे तक इसी कामचलाऊ व्यवस्था के चलते बेहतर शासकीय योजनाओं और अकूत धन आवंटन के बावजूद सुखद परिणामों के रास्ते में सारे स्पीडब्रेकर बरकरार रहे।





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