अजमेर.
नगर परिषद के अफसरों की मुस्तैदी की पोल एक बार फिर खुल गई है। जिस जमीन का मालिकाना हक हासिल करने के लिए परिषद डेढ़ दशक से भी अधिक समय तक कानूनी लड़ाई लड़ती रही, उसी जमीन पर भवन निर्माण को हरी झंडी देते हुए अफसर नक्शा पास कर कर चुके थे। स्थिति तब और विकट हो गई, जब अदालत ने नगर परिषद को ही जमीन का मालिक मानते हुए अतिक्रमी की ओर से स्थायी निषेधाज्ञा के लिए दायर याचिका खारिज कर दी।
मामला भगवानगंज की विवेकानंद कॉलोनी का है। धनपतराय पुत्र कोड़ूमल ने जमीन के दस्तावेज पेश कर नक्शा मंजूर कराने के लिए आवेदन किया था। अफसरों ने धनपतराय को जमीन का स्वामी मानते हुए 24 जून ’05 को नक्शा पास कर दिया। दूसरी ओर इसी जमीन पर अपना हक जताते हुए नगर परिषद 1990 से कानूनी लड़ाई लड़ रही है।
इस मामले में 11 फरवरी अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ‘धनपतराय यह साबित नहीं कर पाया है कि वह विवादित संपत्ति पर मालिकाना हक रखता हो। इस तरह धनपतराय लाभ प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है। उसकी ओर से प्रस्तुत वाद खारिज किया जाता है।’
मामला, एक नजर..
यूआइटी ने 1990 में इस जमीन पर कब्जा हासिल करने के लिए धनपतराय के मकान को हटाने की कार्रवाई की तो वह अदालत की शरण में चला गया। धनपतराय ने सिविल जज (कनिष्ठ खंड) एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग के समक्ष यूआइटी और नगर परिषद के खिलाफ वाद दायर किया। उसका कहना था कि वह विवादित भूमि का मालिक है। यह जायदाद उसे 15 मार्च 1979 में पिता की वसीयत के जरिए प्राप्त हुई है।
परिषद की दलील
परिषद के वकील अजय गोयल ने अदालत में तर्क था कि धनपतराय यह नहीं बता पाया कि उसके पिता के पास जमीन कहां से आई। वह अनधिकृत रूप से निर्माण करा रहा है। परिषद के कर्मचारियों से मिलीभगत से उसने निर्माण संबंधी स्वीकृति भले ही हासिल कर ली हो, इससे उसका स्वामित्व साबित नहीं होता है। धनपतराय के पिता ने जमीन इशफाक अहमद से खरीदना बताया, लेकिन कोई विक्रय पत्र पेश नहीं किया गया।
फिर भी पास हो गया नक्शा
अदालत में लंबी लड़ाई के बावजूद परिषद अफसरों ने आंखें मूंद कर धनपतराय को जमीन का स्वामी मानते हुए नक्शा पास कर दिया जबकि जेइएन ने आवेदक से खसरा नंबर 5237 की जमाबंदी मांगने को कहा था।
विधि अधिकारी ने सेल डीड, वसीयतनामा और शपथ पत्र के आधार पर धनपतराय को भूखंड का स्वामी मान लिया। परिषद में भू स्वामित्व प्रमाण पत्र जारी करने के लिए अधिकृत एडवोकेट सुभाष जैन ने भी जमाबंदी की जांच के बिना ही प्रमाण पत्र जारी कर दिया।
जमीन की वस्तुस्थिति
मामला खसरा नंबर 5237 में स्थित जमीन का है, जो सिवायचक दर्ज होकर राज्य सरकार में निहित हो गई थी। सरकार इसे 1977 में यूआइटी को हस्तांतरित कर चुकी है। राजस्व रिकॉर्ड में जमीन का नामान्तरण यूआइटी के पक्ष में हो गया है। यूआइटी ने इस क्षेत्र में अजयनगर, भगवानगंज योजना विकसित की है। यूआइटी से भगवानगंज योजना क्षेत्र के हस्तांतरण के बाद अब जमीन परिषद के अधीन है।
‘मामला मेरे समय का नहीं’
यह मामला मेरे समय का नहीं है। मुख्यमंत्री की सुनवाई में भी यह शिकायत परिषद को मिली थी, जांच करवाई जा रही है। अदालत के फैसले के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है।
- एनएल मीणा, सचिव, नगर परिषद
‘जांच कराई जाएगी’
नक्शा पिछले बोर्ड के समय पास हुआ है। सिर्फ नक्शा पास होने से ही मालिकाना हक नहीं बन जाता है। परिषद के अफसरों ने कहां गड़बड़ी की, इसकी जांच कराई जाएगी। अदालत ने परिषद के पक्ष में फैसला दिया है।
- धर्मेन्द्र गहलोत, सभापति